Thursday, June 6, 2013

मैं नाजुक हरसिंगार.....


तुम
बूंदे ओस की
मैं 
पत्‍ती लाजवंती
तुम
पगलाई सी हवा
मैं 
नाजुक हरसिंगार
तुम
घनेरे कारे बदरा
मैं
खेतों की कच्‍ची मेड़

* * * * *
तुम संग जि‍या न जाए
तुम बि‍न जि‍या न जाए
ओ मेरे सांवरि‍या, सुन
बति‍यां ये तुझसे कही न जाए....


12 comments:

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

शानदार,उम्दा प्रस्तुति,,,

RECENT POST: हमने गजल पढी, (150 वीं पोस्ट )

poonam said...

nazuk bahv....bahut sunder

पूरण खण्डेलवाल said...

सुन्दर रचना !!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

खूबसूरत एहसास

Dr.NISHA MAHARANA said...

तुम संग जि‍या न जाए
तुम बि‍न जि‍या न जाए
ओ मेरे सांवरि‍या, सुन
बति‍यां ये तुझसे कही न जाए....bahut badhiya ....

vandana gupta said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(8-6-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!

Manav Mehta 'मन' said...

बहुत बढ़िया

प्रतिभा सक्सेना said...

जीवन का सौंदर्य इसी में है !

M VERMA said...

बहुत खूबसूरत और नाज़ुक एहसास

कालीपद प्रसाद said...

सुन्दर प्रस्तुति !
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kamlesh kumar diwan said...

achcha geet hai umda tulna ki gai hai

Laxmi Kant Sharma said...

कुदरत के खजाने से अद्भुत बिम्ब लेकर एक बेहद खूबसूरत संयोजन ....वाह !!