Tuesday, July 19, 2011

अवश हूं

मैं अवश हूं
स्‍वयं को रोक नहीं पाती
नहीं चाहती
मगर भी....
खिंची चली जाती हूं
तुम्‍हारी ओर,
जानती हूं
तुम और मैं
बहुत अलग हैं
और है
न पाटी जाने वाली
बेहि‍साब दूरि‍यां
मगर
मन ये कब सोचता है
वह तो घूमता है
तुम्‍हारे ही इर्द-गिर्द
और मैं
अवश हो
तुम्‍हें ही ढूंढती हूं
अपने करीब....

1 comment:

बारिशें said...

kahaan se laati hain itni khoobsoorat baat ... aise umda kathya ...

bahut khoobsoorat ...