Saturday, June 11, 2011

बातें


कुछ बातें
तैरती सी आईं
और ढक लि‍या
मेरे पूरे वजूद को
बातें.....
जो भीड़ में अपना अस्‍ति‍त्‍व ढूंढती थीं
अब तन्‍हाई में एकाएक
ऐसे छा गईं मुझ पे
कि‍ अपना होना
न होने के बराबर लगा...
और मेरे आसपास
सि‍र्फ बातें ही बातें थीं
कुछ कही... कुछ अनकही

2 comments:

Samit Kumar Pathak said...

lajabab hai ye rachna jo kisi aur disha main jane ko prerit kar rahi hai.....pat nahi kyon aaj mera man is udhedbun aur asmanjas main kyon aa gaya hai is baatein ko padhkar..

बारिशें said...

वाह ... खूबसूरत
कभी कभी शब्द सहारे बन जाते हैं ... हाँ कभी वे दुश्मन भी बन जाते हैं ... बातें वो जो बोल के करी जाएँ ... आप बहुत अच्छी बात करती हाँ ... आपकी बातों में बनते , मिटते और फिर बन बन जाते आकार होते हैं ...सुन्दर रचना ...

लिखती रहिये ... ज़रा जल्दी जल्दी ... प्यार और आशिर्वाद ...