Friday, February 29, 2008

कैलेंडर

कल
बदल जाएगा
कैंलेंडर में महीना
और बदल जाएगी
उसमें छपी
तस्‍वीर भी,
मगर मैं
नहीं बदलूंगी
रहूंगी
वहीं की वहीं
जहां
कई बरसों से
टंगी हूं
मुझे बदलने की
इच्‍छा
कइयों ने की
और
मेरा मन भी
चाहता है
बदलाव,
मगर ये संभव
नहीं
क्‍योंकि‍
मैं कैलेंडर नहीं जो
कि‍सी की इच्‍छानुसार
बदल जाऊँ
मैं तो वो
सामान हूं
जो
टूट-फूट जाता है
तो घर से बाहर
फेंक दि‍या जाता है
इसे बदलने की
जहमत
कोई नहीं उठाता

5 comments:

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

वक़्त बदलता है आदतें बदलती हैं लेकिन सच नहीं बदलता और न ही कभी बदला जा सकेगा... सुन्दर एवं भावपूर्ण काव्य!!

Krishan lal "krishan" said...

जीवन की सच्चाई बताती कविता। ब्धाई

mehek said...

bahut sundar rashmi ji,insani man koi calendar nahi jo har maah badal jaye,awesome

Keerti Vaidya said...

sahi kha apney .......din maheney badlney sey hum thorey he badaltey hai

डॉ. सुधीर शर्मा said...

aapki is kavita se aaj ke vikral samay ka pata chalta hai. bhavnaon ka jo rang aapne bhara hai wah bahul tarif ke kabil hai.

sudhir sharma
vaibhav prakashan
raipur