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Thursday, July 11, 2024

वाणभट्ट की आत्मकथा बनाम गाँव की व्यथा


अपनी छोटी सी लाइब्रेरी में एक किताब ढूंढ़ रही थी कि अचानक नजर पड़ी एक पीली सी, फटी जिल्दवाली किताब पर। जैसे कितने दिन से बीमार पड़ी हो और सेवा-सुश्रुषा के लिए इंतजार कर रही हो। उत्सुकतावश उसे रैक से निकाला। किताब थी हजारी प्रसाद द्विवेदी की 'वाणभट्ट की आत्मकथा।' 1974 में प्रकाशित 8 रुपए 50 पैसे मूल्यवाली पुरानी किताब थी। मैं यह देखकर हैरान हुई कि यह कोई खरीदी हुई नहीं, बल्कि लाइब्रेरी की किताब है, जिसमें रामेश्वर सिंह पुस्तकालय, ओरमाँझी की मुहर लगी थी।

किताब के हाथ में आते ही अचानक मेरा गाँव मेरे जेहन में करवटें बदलने लगा। जी हाँ, ओरमाँझी मेरे गाँव का नाम है। राँची शहर से महज 20-22 किलोमीटर दूर। अब तो वहां तक पहुँचने के लिए चौड़ी सड़क बन गई है। सड़क के दोनों ओर बाजार बन गए हैं, दुकानें खुल गई हैं। पहले सा वहां अब कुछ भी नहीं रहा। लोगों की आवाजाही, भीड़ और शोर-शराबे में मेरा वह गाँव अब गुम हो गया है जिसकी याद रामेश्वर सिंह पुस्तकालय की मुहर लगी इस किताब ने दिला दी है।

 'वाणभट्ट की आत्मकथा' हाथ में पकड़े सोच रही हूँ कि लाइब्रेरी की यह किताब भला मेरे पास कैसे? हम शहरी हो चुके लोगों की स्मृतियाँ अब तकनीकों पर निर्भर रहने लगी हैं। मेरी स्मृतियाँ उस दौर की हैं जब इक्के-दुक्के घर में लैंडलाइन फोन हुआ करता था। टीवी नाम की कोई चीज होती है - यह पढ़ा तो था, मगर पहली बार तब देखा जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी, और गांव में एक अकेले घर में टीवी देखने के लिए इतनी भीड़ उमड़ पड़ी थी कि लगा कोई मेला हो। सामने बैठी भीड़ और पीछे खड़े बेशुमार लोग...और हम जैसे बच्चे उचक-उचक कर प्रधानमंत्री की अंतिम यात्रा देख रहे थे। हालांकि साल बीतते-बीतते हमारे घर भी ब्लैक एंड व्हाइट टीवी आ गया, जिसमें आनेवाले कृषि दर्शन का भी इंतजार बहुत शिद्दत से किया जाता था।

बाद के दिनों में लैंडलाइन फोन भी बहुत सामान्य सी बात हो गई थी, यानी एक मोहल्ले में दो-चार फोन तो होते ही थे। ये सारे फोन नंबर हमारी जुबान पर बसे होते। फोन नंबर के लिए डायरी पलटने की जरूरत नहीं पड़ती थी। हालांकि तब भी हमसब अपने पास छोटी सी फोन डायरी रखते थे, जहां सबके नंबर नोट रहा करते थे। लेकिन अभी याद करने की कोशिश कर रही हूं तो अपने बच्चे, पति और दोस्‍तों में भी किसी के मोबाइल का नंबर याद नहीं। मजे की बात यह कि मुझे खुद का दूसरा नंबर याद नहीं। जब जरूरत पड़ती है तो मोबाइल के फोन कॉन्टैक्ट में जाकर नंबर निकाल लेती हूँ।

 कह सकती हूँ कि तकनीकों ने हमें कई तरह की सुविधाएं दी हैं, लेकिन उसपर निर्भर होकर हमने अपना बहुत कुछ गवां दिया है। एक बड़ा हमला तो हमने अपनी स्मृतियों पर ही कर दिया है। अब आँकड़े और फैक्ट हमारी स्मृतियों में नहीं गूगल पर बसने लगे हैं। इसी खोई हुई स्मृति का नतीजा है कि मैं हैरत में हूं लाइब्रेरी को याद कर, जो मेरी स्मृति में नहीं रह गई थी। वाणभट्ट की आत्मकथा ने मानों कई स्मृतियों पर से धूल हटा दी। जेहन का एक पूरा परत धूलरहित कर दिया और मुझे मेरे गाँव की लाइब्रेरी बिल्कुल साफ-साफ दिखने लगी। सच बताऊं तो गाँव आते जाते कई बार यह ख्याल उठता रहा था कि गाँव में पढ़ने-लिखने का माहौल बनाने के लिए एक लाइब्रेरी खोलनी चाहिए। पर इस दौरान कभी मेरी स्मृति में रामेश्वर सिंह पुस्तकालय नहीं आया। 

गाँव में पुस्तकालय खोलने का इरादा इसलिए भी बनता रहा है कि गाँव मुझे प्रिय है। वहाँ का जीवन अब भी लगभग ऐसा ही है कि सूरज डूबने और उगने के साथ ही दिनचर्या खत्‍म और शुरू होती है। यद‍ि शाम ढलने के बाद के समय का सदुपयोग किया जाए, तो बहुत से बच्चों का जीवन और बेहतर हो जाएगा। ज्ञान और अनुभवों की निधि तो पुस्तकों से ही प्राप्त की जा सकती है न! 

मेरे मन में अनवरत चलते विचारों को इस सुखद हैरत ने थाम लिया कि ओरमाँझी में तो बकायदा पुस्तकालय हुआ करता था, जिसका प्रमाण है यह किताब। मगर इतनी महत्वपूर्ण बात भला मैं भूल कैसे गई...?

मेरे घर के ठीक सामने एक मंदिर हुआ करता था। हालांकि अब उसका वह अस्तित्व ही समाप्त हो गया जो मेरी यादों में है। समय के साथ सब परिवर्तित होता गया।अब तक मेरी यादों में बसे उस पुराने मंदिर को तोड़कर एक भव्य मंदिर का निर्माण हो चुका है। अब केवल मंदिर बचा है... मेरे बचपन में उस जगह खेल का मैदान था... वहां नाटक खेला जाता था... वहां छउ नृत्य का आयोजन होता था, वहां नेताओं के भाषण होते थे ..और तो और मदारियों का करतब भी वहीं देखते थे हम। मुख्य मंदिर में प्रति वर्ष दो बार माँ दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती थी और पांच दिनों का उत्सव मनाया जाता था। उसी मंदिर के अगल-बगल दो कमरे थे, जिसमें बाईं तरफ का कमरा पूजा-पाठ के दौरान सामान रखने के काम आता था और दाईं ओर वाले कमरे के ऊपर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था 'रामेश्वर सिंह पुस्तकालय।

मैं नहीं जानती रामेश्वर सिंह को, जिनके नाम पर यह पुस्तकालय खोला गया था, मगर वह मेरे लिए अभिनंनदनीय हैं,  जिन्होंने एक ऐसे गाँव में पुस्तकालय की स्थापना की, जहां मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं थीं। यह अलग बात है कि उनके नेक विचारों को संभालकर आगे बढ़ाने वाला कोई व्यक्ति नहीं मिला, वरना कम से कम पुस्तकालय का अस्तित्व तो नहीं मिटता।  

यादों पर पड़े जाले साफ करने से याद आता है कि अंदर लकड़ी के आलमीरे में खूब किताबें थीं...ठूसी हुईं-सी, जहां घुसने पर अजीब तरह की सीली गंध घेर लेती थी। शाम होते ही बल्‍ब की पीली रौशनी जब दरवाजे से बाहर न‍िकलकर बरामदे पर पड़ती तो पता चल जाता क‍ि गांव के ही रघु चाचा अपना द‍िन का काम खत्‍म कर अवैतनि‍क लाइब्रेरियन के रूप में कार्यभार संभालने आ गए हैं। 

मैं तब बहुत ही छोटी थी और मेरा उपयोग बस इतना था कि माँ मुझे भेजती थीं किताबें लाने के लिए। मुझे याद है उस समय माँ के माथे से पल्लू कभी सरकता नहीं था और किसी बाहरी आदमी से कुछ लेन-देन करना हो तो दरवाजे की ओट से उनका हाथ ही बाहर आता था। इसलिए इस आदान-प्रदान का माध्यम मैं ही बनती थी। 

हालांक‍ि उस समय पर्दा या घूंघट प्रथा नहीं थी क्‍योंक‍ि मां घर में आराम से साड़ी का पल्‍लू कमर में खोंसकर काम क‍िया करती थी। बस जब दादाजी घर के अंदर आते तो उनकी आहट म‍िलते ही सर पर पल्‍लू रख लेतीं थी मां। दादी कभी सर पर आंचल नहीं लेती थीं, मगर मां बाहर वालों और खासकर क‍िसी बुजुर्ग को देखते ही झट माथे पर आंचल खींच लेतीं।  

कई बार लाइब्रेरी बंद कर लौटते समय रघु चाचा मेरी माँ के लिए किताबें ले आते और दरवाजे से मुझे पुकारते। उस समय मां की रसोई का वक्‍त होता था इसल‍िए अपना नाम सुनकर मैं बाहर दौड़ती और पहले उनकी लाई किताब माँ को थमाती और वापसी में उनको माँ की पढ़ी हुई किताबें पकड़ा देती। 

मैं तो यह बात बिलकुल भूल गई थी कि इसी किताब को तीन बार रीन्यूवल कराने के बाद भी माँ की पढ़ने की इच्छा बरकरार रही तो उन्होंने इसका मूल्य चुकाकर अपने पास रख लिया था... और जाने कैसे यह मेरी लाइब्रेरी की किताबों के बीच चुपचाप छुपा रहा। तब गाँव की महिलाएँ उस पुस्तकालय तक नहीं जाती थीं... पुस्तकालय ही क्यों...सब महिलाएँ घर से बाहर बस तीन वजहों से निकलती थीं... उन्हें डॉक्टर के पास जाना हो, मंदिर जाना हो या फिर वोट देने। उनके पास चौथी कोई वजह नहीं थी, जिसके लिए देहरी से उनके पाँव बाहर आते। ऐसे माहौल में मेरी माँ का जबरदस्त पाठक होना अभी भी हैरान करता है मुझे।  

मुझे याद है, मेरे पिता अखबार नियमित रूप से पढ़ते थे मगर किताबों में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी, इसलिए माँ ही लाइब्रेरी की सदस्य बन गई थीं। जाने पि‍ता की रजामंदी से या छुपकर.. पता नहीं। उन दिनों गाँव में किताबों की दुकान नहीं होती थी, इसलिए पुस्तकालय ही एकमात्र जरिया था अपनी पढ़ने की भूख शांत करने का। दोपहर के एकांत में मां को हमेशा ही क‍िताब पढ़ते पाया था मैंने।

अतीत हमेशा से बहुत सुंदर और मोहक लगता है। अब याद करती हूं तो याद आता है कि जब मेरी उम्र कहानियां और उपन्यास पढ़ने की हुई, तब तक लाइब्रेरी बंद हो चुकी थी। वैसे किताब की दुकान तो अब भी नहीं है वहां, वहीं ही क्‍यों..शहरों में भी एक-एक कर सभी दुकानें बंद हो चली है...और अब सारा ज्ञान लोग मोबाइल से प्राप्त करते हैं। बदलते गांव को देखती हूं तो निराशा होती है। अब न वहां पहले की तरह प्यार है न व्यवहार। भले ही सिर से पल्लू उतर गया हो, औरतें हाट-बाजार करने लगी हैं, मगर यह किसी के ख्याल में नहीं आया कि मरती हुईलाइब्रेरी को बचा लिया जाए, या गाँव में पढ़ने की संस्कृति विकसित हो। बल्कि अब वो गाँव , कस्बा हो गया है और निरंतर कई होटल और मॉलनुमा दुकानें खुल गई हैं, मगर बौद्धिक विकास के लिए अब भी वहां कोई प्रयास नहीं किया जा रहा।   

उन दिनों साप्ताहिक बाजार में एक किताब की दुकान लगती थी, जिसमें चंपक, नंदन, मधु मुस्कान से लेकर राजन-इकबाल, गुलशन नंदा, रानू और सुरेंद्र मोहन की किताबें बिकती थीं। यह दुकान बाजार के एकदम अंतिम छोर पर लगा करती थी, जैसे कोई उपेक्षित चीज हो, जिसकी माँग ऐसी नहीं कि उसका सामने प्रदर्शन कर  ग्राहकों को आकृष्ट किया जाए। हालांकि मैं उस दुकान की नियमित ग्राहक थी क्योंकि माँ के लिए किताबें लाते-लाते पढ़ने का चस्का मुझे भी लग चुका था।

उन दिनों आस-पड़ोस की लड़कियां जो हाई स्कूल में पढ़ती थीं, सब माँ की दोस्त होतीं और मेरी बुआएं बन जातीं। स्कूल के बाद वो सब की सब माँ के पास आ जातीं और उनकी बैठकी जमती... फिर वो पत्रिकाएं, उपन्यास पूरे गांव में घूमते, जिसे शायद छुपाकर पढ़ा जाता, क्योंकि दादी के शब्दों में माँ काम का हर्जा कर किताबें पढ़ती थीं... इसलिए दादी को देखते ही किताबें छुपा दी जातीं।  

 हालांकि माँ बहुत काम करती थीं, और उन दिनों घर में मेहमानों का तांता सा लगा रहता था। तब न फोन था न ही पूछकर किसी के घर जाने का चलन। रिश्तेदार और दोस्त अचानक आ जाते और हफ्तों रहते। न उन्हें जाने की जल्दी होती न घरवालों को भगाने की हड़बड़ी। मिट्टी के चूल्हे पर खाना पकता और पाँत में बैठकर सब खाते। लकड़ी सुलगाते और उससे निकलते धुएँ से माँ की आँखें लाल हो जातीं, मगर कभी कोई शिकायत नहीं की।  तब न मिक्सी थी न फ्रिज...न ही गैस का चूल्हा... फिर भी बहुत कुछ पकातीं मेरी माँ... खुशी-खुशी। दूर गांव से कोई रेलयात्रा के लिए जाता, तो बीच रास्ते उतरकर घर आ जाता कि रात की गाड़ी है... दोपहर यहीं खा कर निकलेंगे और रात की रोटी बांध देना। न कहने वाले को हिचक, न देने वाले के माथे पर शिकन...

 बाजार से खरीदी हुई सब्जियों को ताजा रखने का एक जुगाड़ उस समय देखा था। पकी हुई सब्जी हो या बिना पकी हुई, उन्हें किसी बर्तन में रखकर रस्सी से उस बर्तन को बांध दिया जाता था और घर में बने गहरे कुएँ में पानी के पास लटका दिया जाता था। कच्ची सब्जियों को ताजा रखने का एक दूसरा उपाय था कि मिट्टी की जमीन पर सब सब्जियां रखकर उसके ऊपर जूट का बोरा भिंगाकर ढक दिया जाता। इस तरफ हफ्ते भर सब्जियां हरी रहतीं। यकीन मानिए मेरी यादों में उन सब्जियों का हरापन अबतक बचा रह गया है, जो अब फ्रिज भी नहीं बचा पाता। धनिया-पुदीना कभी बाजार से खरीदना नहीं पड़ता था। कुएँ के आसपास की जमीन पर धनिया-पुदीना के पौधे लहलहाते रहते, जब जरूरत हुई, जितनी जरूरत हुई तोड़ लिया। इन पौधों को पानी देने की भी जरूरत नहीं पड़ती थी। क्योंकि कुएँ के आसपास नहाने से लेकर बर्तन माँजने तक का काम होता था और इस दौरान बहने वाला पानी इन पौधों तक खुद पहुंच जाता था। उस पुदीने की जो महक हुआ करती थी, वह अबके पुदीने में नहीं मिलती।

लाइब्रेरी और किताबों की बात से ध्यान आया कि किसी क्लास की किताबें कैसे एक हाथ से दूसरे हाथ तक होती हुईं सालों साल विद्यार्थियों के काम आती थीं। कोर्स की किताबों का ऐसा उपयोग होता कि जैसे रेशा-रेशा वसूल करे कोई। पांचवीं कक्षा में जानेवाले छात्र के माता या पिता पहले से ही छठवीं कक्षा में जाने वाले बच्चे और उसके माता-पिता को कह देते कि उसकी किताब मुझे दे देना। परीक्षा समाप्त होने के बाद सीनियर बच्चे से किताबें ले ली जातीं।

 बड़े शौक और खुशी से परीक्षा परिणाम आने के पहले ही पुरानी जिल्द हटा दी जाती...भूरे रंग का, थोड़ा खुरदुरा खाकी पेपर आता। बच्चा अपनी माँ की सहायता से आटे को पकाकर उससे लेई (गोंद) तैयार करता। फिर एक-एक कर पुरानी किताबों पर नई जिल्द चढ़ती। उसे अच्छे तरीके से साटकर नया-सा बना दिया जाता। उन किताबों के ऊपर सफेद  कागज चिपकाया जाता और स्केल से लाइन खींचकर नाम लिखने की जगह बनाई जाती। मगर अभी नाम नहीं लिखा जाता, क्योंकि सीनियर बच्चा इस शर्त के साथ किताबें देता कि अगर वह फेल हुआ...तो वापस ले लेगा।

 हालांकि किताबें उन्हीं छात्रों से ली जातीं, जिन पर भरोसा होता कि वह फेल नहीं करेगा। यह सिलसिला तब तक चलता जब तक किताब फट न जाए और पढ़ने लायक न बचे। इस तरह किताबों के एक सेट से कई साल बच्चे पढ़ लेते। यह आपसी प्रेम का भी परिचायक है और बचत का भी। कोई बच्चा नाक सिकोड़कर फरमाइश नहीं करता  कि उसे नई किताबें ही चाहिए। परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद कॉपियाँ खरीदकर उन पर जिल्द चढ़ाई जाती और पिछले वर्ष की कॉपियों के बचे पन्ने को एक साथ सीलकर उनसे रफ कॉपी बनाई जाती।  

अब इस्तेमाल की यह प्रणाली गांवों से भी बाहर हो गई। ठहर कर सोचिए तो पता चलेगा कि इस व्यवस्था के खत्म होने के पीछे का कारण है हर वर्ष किताब के सेट में थोड़ा सा बदलाव। इससे एक ही घर का बच्चा आगे की कक्षा में पढ़ रहे भाई या बहन की किताबों का उपयोग नहीं कर पाता। खासकर निजी स्कूल मैनेजमेंट कमीशन के लालच में निजी प्रकाशकों की किताबें ही कक्षा में चलाते हैं और इस कारण विद्यार्थियों को नई किताबें खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

उन दिनों क्लास से बाहर की किताबें पढ़ने वाले बच्चों का अपना ग्रुप होता। एक किताब को सब पढ़ते..एक-एक कर। स्कूल के बाद वाला समय जुगाड़ और खेल का होता। पहले मानसिक संतुष्टि के लिए किताब की खुराक जमा की जाती, फिर बाहर खेलते भागते बच्चे। कल्पनाओं की दुनिया में घिरे बालक कभी जमीन खोदकर पाताल में बौने ढूंढ़ने की कोशिश करते तो कभी उड़ने वाले ड्रैगन तलाशते। गांव के बच्चे खेल-खेल में प्रकृति को जानते-समझते।

आजकल के बच्चों से पूछा जाए तो वे शायद पपीता और पाकड़ के पेड़ भी न पहचानें, मगर ग्रामीण बच्चे खेल-खेल में शिक्षा ग्रहण करते।  एक खेल हुआ करता था- अत्ती -पत्ती कौन पत्ती। सब बच्चे एक जगह इकट्ठा होते और उनमें से एक बच्चा निकलकर दौड़ जाता गांव में किसी भी ओर और किसी पेड़ की पत्ती तोड़ लाता। बाकी बच्चों को उसे पहचानना होता कि किस पेड़ की पत्ती है। जो जवाब नहीं दे पाता, उसकी बारी होती कि वह कोई ऐसा पत्ता लाए, जिसे पहचानना कठिन हो। इस क्रम में छोटी उम्र से ही बच्चे लगभग सभी पेड़-पौधे पहचानने लगते थे, जिससे आगे जाकर उनका प्रकृति से गहरा जुड़ाव हो जाता था। बच्‍चे सभी पेड़ पौधों की व‍िशेषता से वाकि‍फ होते थे और अनजाने ही प्रकृत‍ि की सुरक्षा की भावना उनमें घर कर जाती थी। आम की गुठली खाकर फेंकने पर भी उसमें पत्‍ते न‍िकल आते तो बड़े एहत‍ियात से उसे ऐसी जगह रोप द‍िया जाता ज‍हां उसे पेड़ बनने में कोई परेशानी न हो। अब तो गांवों में भी जगह म‍िलना मुश्‍क‍िल हो गया है। घर और उसके चारों ओर इंच-इंच को पक्‍का करना शायद शहरी और अमीर होने की न‍िशानी मान ली गई है। 

 सब कुछ सीख लेना, पा लेना सबके नसीब में नहीं होता। झारखंड के एक सज्जन को 'लाइब्रेरी मैन' के नाम से पुकारा जाता है। यह एक ऐसा इनसान है, जिसका सपना था आईएएस अधिकारी बनने का, मगर गरीबी के कारण महँगी किताबें नहीं खरीद पाए और उनका सपना, सपना ही बनकर रह गया। अपनी परेशानी को जानते हुए इस इनसान ने गरीब बच्चों की सहायता के लिए राज्य के पांच जिलों में 40 पुस्तकालय की स्थापना की और इस लाइब्रेरी की मदद से हजारों युवा अपने सुनहले भविष्य की इमारत गढ़ने में लगे हैं।

 कुछ सुखद है तो बहुत कुछ दुखद भी। मेरे गांव की लाइब्रेरी के बंद हो जाने का जितना दुख मुझे है, उससे शायद कहीं ज्यादा ही दुख हुआ था, जब पता चला था कि करनाल में 'पाश पुस्तकालय'  तोड़ दिया गया। मन बड़ा ही आहत हुआ था सुनकर कि पुस्तकालय की 8 हजार किताबें तीन जगह शिफ्ट कर दी गईं। अगर हम साहित्य को संभालकर नहीं रखते, तो समाज को कैसे संभालेंगे... उस पर वह पुस्तकालय जो अवतार सिंह सिंधू के नाम पर स्थापित थी, उसे हम बचा नहीं पाए तो क्या हैरानी की बात है कि रामेश्वर सिंह पुस्तकालय की किताबों को दीमक लगने के बाद पुस्‍तकालय ही बंद कर दिया जाए।

किताबें बागी बनाती हैं...यह पुरातन सोच है मगर आज भी कहीं-न कहीं लोगों के मन में यही बात है।  इन दिनों  स्त्री चेतना, स्त्री आलोचना पर कई किताबें आई हैं। साथ की एक महिला, जो खुद रचनाकार हैं, उसने इन किताबों को उलट-पलट कर वापस दिया। पूछने पर कि क्यों नहीं लिया, उनका जवाब था कि कहीं इन्हें पढ़कर प्रभावित हो गई, सवाल उठाने, विरोध करने लगी तो मेरा परिवार ही टूट जाएगा। 

 इक्कीसवीं सदी में इस सोच पर बेशक किसी को भी हैरत होगी, मगर बहुत कुछ बदलना अभी बाकी है। उस दौर में भी जब मध्यमवर्गीय परिवार की स्त्रियों को घर से बाहर निकलने नहीं दिया जाता था, इसी इलाके में मेहनतकश आदिवासी औरतें अपने लिबास और औरतों के पुरातन डर को परे हटाकर खेतों में काम करतीं और जंगलों में विचरती थीं क्योंकि उनका सामाजिक ढांचा ही ऐसा है। मगर क्या उन्हें शिक्षित होने की जरूरत नहीं..  क्या उनको देश-विदेश और विज्ञान की बातें नहीं जाननी चाहिए?  

यह भी एक सच है कि बेहतरीन जिंदगी की उम्मीद में शहरों का रुख करने से अब गांव के गांव खाली हो रहे हैं। पुरानी विरासत पर नए रंग रोगन चढ़ाने की कोशिश में सब कुछ बदरंग हुआ जा रहा है... हम अपने मूल्य खो रहे हैं। ऐसे समय में जब सतही और उथले ज्ञान का बोलबाला है.. पुस्तकों की जरूरत और शिद्दत से महसूस होती है। खासकर गांवों में बेवजह समय गुजारने वाले बच्चों को प्रतियोगी परीक्षा से लेकर कॉमिक्स, लिटरेचर आदि की किताबें एक साथ मिल जाएं, तो उनकी जिंदगी सँवर जाए।

इन दिनों गांव में भी लोगों को ई - बुक्स के बारे में पता है। एक तो वैसे भी कोरोना काल में पढ़ाई के लिए बच्चों के हाथों में मोबाइल दे दिया गया। अब यह स्लोगन वास्तव में चरितार्थ हो गया है कि 'दुनिया मेरी मुट्ठी में।एक क्लिक में हम जो चाहें, ढूंढ़ या देख सकते हैं। इसके लिए किताबों का पन्ना पलटने की जरूरत नहीं। फिर उस पर चैटजीपीटी के आने से किसी भी सवाल का जवाब तुरंत पा सकते हैं। पर शायद इस खतरे से अनजान हैं लोग कि जो फायदा किताब पढ़ने से होता है, वह कभी ई - बुक्स या किसी भी सर्च इंजन के इस्तेमाल से नहीं पा सकते। किताबें पढ़ते हुए हमारे अंदर एक दृश्य बनता जाता है और पढ़ा हुआ सब हमारे दिमाग में धंस जाता है। जबकि ऑनलाइन पढ़ी हुई बातें हमारे जेहन से जल्दी ही उतर जाती हैं। मगर लोगों को समझ नहीं आती यह बात, इसी कारण पुस्तकालय की जरूरत को कई जगह नकारा जा रहा है।

हालांकि यह सुखद है कि इन दिनों गांव-गांव में कम्युनिटी लाइब्रेरी खुल रही है और उत्साही युवा इसे अलग-अलग गांव कस्बों में खोल रहे हैं। खेती-किसानी करने वाला परिवार अपने बच्चों को महँगी किताबें खरीदकर नहीं दे सकता, मगर ऐसे बच्चे लाइब्रेरी का फायदा उठा सकते हैं। अब गांव-गांव लाइब्रेरी की मुहिम जोरों पर है तो झारखंड सहित पूरे देश में उम्मीद कि लाइब्रेरी खुलेगी और मैं भी अपने गांव के पुस्तकालय में वाणभट्ट की आत्मकथा वापस रख दूंगी।

 गांव की यादें ऐसे खींचती हैं कि लगता है शहर छोड़ वहीं बस जाए जाए, जहां सुविधाएं तो कम थीं, मगर प्रेम इतना कि छलकता रहता। भूख लगने पर किसी के घर भी खाना मिल जाता था। तब पानी-भात और अचार में जो स्वाद मिलता था, वह आज के छप्पन भोग में भी कहां। मिलकर खाने से स्वाद और बढ़ जाता है, भूख और तेज हो जाती है। सामूहिकता में जीने वाले हमसब कभी नहीं जानते थे कि न्युक्लियर परिवार क्या होता है। सामूहिकता में जीने के अभ्यास ने हमें उदार बनाया था और निजी खुशियों, सुकून और एकांत की तलाश में बने अब के न्युक्लियर परिवार ने हमारे जीवन को एकाकी और उदास बनाया है। हो सके तो आइए, हम अपने गाँव की ओर चलें। उसे समृद्ध बनाएँ। विकसित बनाएँ और गाँव का वह ‘देहातीपन’ बचाए रखें जिसे इनसानियत, प्यार, स्नेह, अपनत्व, लगाव और स्वाभिमान के रूप में हम जानते हैं।

Sunday, May 13, 2018

ऐसे में कैसे मनाएं मदर्स डे ?



आज मदर्स डे है। मातृ दि‍वस अर्थात मां के लि‍ए नि‍र्धारि‍त दि‍न। अब हम सब के लि‍ए यह खास दि‍न बन गया है क्‍योंकि‍ हर कि‍सी को अपनी मां से वि‍शेष लगाव और प्‍यार होता है। कुछ पंक्‍ि‍तयां है....

''कभी पीठ से बंध, तो कभी लगकर सीने से
मुझे फूलों की खुशबू आती है मां के पसीने से
जब होता है सर पे मेरे, मां के आंचल का साया
चलती हैं सावन की पुरवाइयां जेठ के महीने में''

यह पंक्‍ति‍यां कि‍सी भी बच्‍चे के दि‍ल की भावनाओं को व्‍यक्‍त करने के लि‍ए बहुत है। मां का स्‍थान इसलि‍ए सर्वोपरि‍ माना गया है क्‍योंकि‍ मां से ज्‍यादा कोई करीब नहीं होता कि‍सी इंसान के। वह अपने बच्‍चे के रग-रग से वाकि‍फ होती हैं। उसके सुख-दुख की साथी, उसके ऊंच-नीच की साक्षी।  मगर इन दि‍नों जब हम एक मां के बारे में सोचते हैं, खासकर एक बेटी की मां की मनोदशा तो महसूस करते हैं कि‍ मां की भूमि‍का नि‍भाना कि‍तना कठि‍न होता है।

पि‍छले दि‍नों मेरी सहेली से मुलाकात हुई बहुत अरसे बाद। वह एक प्‍यारी सी बेटी की मां है जो, अब 13 वर्ष की होने जा रही है। मुझे लगता है वह खुशकिस्‍मत है कि‍ उसे भगवान ने बहुत प्‍यारी और खूबसूरत बच्‍ची की मां बनाया है।

मैंने उससे न मि‍लने की शि‍कायत की तो उसका दर्द उभर आया। कहने लगी- तुम्‍हें पता नहीं इन दि‍नों क्‍या हालत हो गई है मेरी। हर वक्‍त चि‍ंता से घि‍री रहती हूं कि‍ कैसे, क्‍या करूं। बेटी के 18 वर्ष पूरे होने  के इंतजार में हूं। तुरंत उसकी शादी कर दूंगी। मैंने हैरत से पूछा- आज के जमाने में तुम ऐसी बात करती हो। बि‍टि‍या को पढ़ा-लि‍खा कर अपने पैरों पर खड़ा करो। शादी की सोचने का कोई अर्थ ही नहीं।

उसने जवाब दि‍या- यह दर्द एक बेटी की मां ही समझ सकती है कि‍ आज के दौर में  बेटी को पालकर सुरक्षि‍त बड़ा करना कि‍तना कठि‍न हो गया है। रोज बलात्‍कार और हत्‍या की खबरें पढ़कर मेरा रोम-रोम इस भय से कांपता रहता है कि‍ कहीं कोई दुर्घटना अपनी बेटी के साथ घटि‍त न हो जाए। उसेे स्‍कूल बस तक छोड़ना-लाना, उसे टयूशन के लि‍ए साथ लेकर जाना और बाहर बैठकर इंतजार करना।  खेलने के लि‍ए पार्क में ले तो जाती हूं, मगर कुछ दूर में बैठकर नि‍रंतर उस पर नजर रखती हूं। घर के आसपास आने जाने वाले सभी पर चाहे वो मर्द हो या लड़का, मेरी संदेह भरी नजर टि‍की रहती है। सच है, मैं कि‍सी पर वि‍श्‍वास नहीं कर सकती। मैं एक जासूस जैसा महसूस करती हूं खुद को। बेटी को छोड़कर कहीं बाहर नि‍कलना संभव नहीं।  मेरी दुनि‍या उसके आसपास सि‍मट कर रह गई है। जानती हूं, इस कदर पहरेदारी उसके मानसि‍क वि‍कास के लि‍ए उचि‍त नहीं। आजकल वो मेरे साथ चलने पर प्रति‍रोध करती है। कहती है- मैं बड़ी हो गई हूं। मैं कैसे बताऊं उस बच्‍ची को कि‍ जो हालत है देश में इन दि‍नों, वह कि‍तनी असुरक्षि‍त है।

मैंं समझ गई कि‍ वाकई वो बहुत परेशान है अपनी बेटी की सुरक्षा को लेकर। उसका भय मायने रखता है क्‍योंकि‍ आज हम उस दौर से गुजर रहे हैं जहां दो वर्ष की बच्‍ची और 90  वर्ष की औरत मेे कोई अंतर नहीं रहा। बस एक मादा जिस्‍‍‍म हैै जि‍सेे इंसान रूपी भेड़ि‍या कभी भी झि‍ंझोड़ सकता है। गांव की बात हो या शहर की, देश के
कि‍सी राज्‍य की बात हो या जि‍ले की, कहीं भी सुरक्षि‍त नहीं लगती औरत। जि‍तना भय उसे बाहर वालों से है उतना ही अपने परि‍चि‍त और रि‍श्‍तेदारों से भी है।

 गौरतलब है कि‍ यह वही देश है जहां मातृ पूजा की परंपरा है। नारी को शक्‍ति‍ मानकर पूजा जाता है। मगर अब नारी न मां है न बहन है न बेटी है। रह गयी है तो बस भोग्‍या, एक मादा जि‍स्‍म। नि‍रतंर सामूहि‍क बलात्‍कार की शि‍कार हो रही बच्‍चि‍यों का जीवन अंधकारमय है। ऐसी बच्‍चि‍यां जि‍न्‍हें अपने शरीर का भी ज्ञान नहीं, उनके साथ अत्‍याचार हो रहा। चाहे जम्‍मू-कश्‍मीर का कठुआ कांड हो, चाहे झारखंड की आदि‍वासी बच्‍ची और उन्‍नाव गैंग रेप की बात हो, इनके साथ अनाचार होना आम बात हो गई है। हमारे देश में नारा 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' खूब चलता है। हम लि‍ंग अनुपात में अब तक बराबर नहीं हो पाए हैं। कन्‍या भ्रूण हत्‍या न हो, इसलि‍ए लि‍ए सरकार तमाम कोशि‍श कर रही है। मगर क्‍या है कि‍ जब हम कन्‍या को जन्‍म तो दे रहे हैं, मगर उसकी सुरक्षा को लेकर इतने भयभीत है कि‍ एक पढ़ी-लि‍खी महि‍ला भी बजाय अपनी बेटी को आत्‍मनि‍र्भर बनाने के उसकी जल्‍द से जल्‍द शादी कर देना चाहती है। उसे एक सुरक्षि‍त हाथों में सौंपना ही प्रथम कर्तव्‍य हो जैसे। यह आगे बढ़ने के बजाय पीछे जाना है।

इस हाल में कैसे कोई मातृ दि‍वस मना सकता है। अपनी मां को ही मां मानकर इज्‍जत देना काफी नही हैं। हर मां को अपनी मां समान माना जाए और छोटी-छोटी बच्‍चि‍यों को अपनी बेटी मानने न लगे लोग,  कोई भी मां अपनी बेटी की सुरक्षा को लेकर इतनी आशंकि‍त न रहे, तभी सही अर्थ में मातृ दि‍वस मनाया जा सकता है।   

Monday, May 15, 2017

शराबबंदी : दूरगामी परि‍णामों की उम्‍मीद


अप्रैल 2017 देश में अत्‍यधि‍क गर्मी के कारण चर्चित रहा, मगर इससे कहीं ज्‍यादा चर्चा रही सुप्रीम कोर्ट के आदेश की, कि‍ राष्‍ट्रीय राजमार्ग और स्‍टेट हाईवे से 500 मीटर दूर तक नहीं होगी शराब की दुकान। जाहि‍र है इस आदेश से देश में हडकंप है। कुछ लोग वि‍रोध में हैं तो कुछ समर्थन में। अनुमान है कि‍ इससे करीब 50 हजार करोड़ का नुकसान होगा राज्‍यों को। होटल इंडस्‍ट्री को दस-पंद्रह हजार करोड़ का झटका लगेगा तो उधर करीब दस लाख लोगों की नौकरी खतरे में पड़ सकती है।

अभी फायदे और नुकसान का आकलन कि‍या जा रहा है। मगर इन सबसे परे हम अपना ध्‍यान थोड़ी देर के लि‍ए केंद्रि‍त करते हैं बि‍हार की तरफ जहां पि‍छले वर्ष 2016 में नीतीश सरकार ने राज्‍य में पूर्ण शराबबंदी की घोषणा और तमाम वि‍रोध के बाद भी यह बंदी लागू है और नीतीश सरकार के इस कदम की सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। इससे पहले केरल को शराबबंदी में सफलता मि‍ली। वहां केवल पांचसि‍तारा होटलों में शराब परोसी जाती है। कई राज्‍यों ने ऐसा करना चाहा मगर सफल नहीं हुए।

यहां एक बात यह भी उल्‍लेखनीय है कि‍ बि‍हार में शराबबंदी के पीछे मुख्‍य रूप से महि‍लाओं की मांग थी। 9 जुलाई 2015 को पटना की एक सभा में जीवि‍का से जुड़ी महि‍लाओं ने मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार से सार्वजनि‍क रूप से यह मांग की थी कि‍ राज्‍य में शराबबंदी लागू की जाए। मुख्‍यमंत्री ने उसी मंच से महि‍लाओं को आश्‍वासन दि‍या था कि‍ अगले चुनाव में जनादेश मि‍ला तो अवश्‍य शराबबंदी लागू करेंगे। नीतीश चुनाव जीते और अपना वादा पूरा कि‍या। एक अप्रैल 2016 से इसे लागू करने का फैसला लि‍या और कड़ा रूख अपनाते हुए राज्‍य में शराबबंदी कर दी। इधर 1 अप्रैल 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने बंदि‍श लगाने का आदेश दि‍या है, जि‍ससे सब तरफ अफरातफरी का माहौल है। 

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला इस आधार पर लि‍या कि‍ शराब पीकर वाहन चलाने से अत्‍यधि‍क सड़क हादसे होते हैं। दरअसल भारत में सड़क हादसे के कारण सबसे ज्‍यादा जानें जाती है पूरी दुनि‍या में। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि‍ राजर्माग के कि‍नारे शराब नहीं बि‍केगा तो हादसों में कमी आएगी। 

अब हम आते हैं महि‍लाओं की मांग के बारे में। आप सभी को याद होगा कि‍ गाहे-ब-गाहे यह खबर आती थी कि‍ अमुक गांव की महि‍लाओं ने मि‍लकर शराब की भट्ठी तोड़ डाली। देसी शराब के ठेके उजाड़ दि‍ए और लाठी-डंडे से वि‍रोध करने वालों को पीटा। यह कोई नई खबर नहीं। बहुत सालों से वि‍रोध होता आया है। इस सब वि‍रोध के पीछे महि‍लाओं का अपना दर्द है। ज्‍यादतर महि‍लाओं का यह मानना है कि‍ उनके पति‍ या बेटा शराब पीकर घर में मार-मीट करते हैं। कमाई के सारे पैसे खर्च कर देते हैं और कई बार लत के कारण कच्‍ची या जहरीली शराब के कारण असमय मौत के शि‍कार हो जाते हैं। 

जाहि‍र है इन सब घटनाओं के पीछे कारण केवल शराब है और उससे उपजी पीड़ा है जो प्रत्‍यक्ष रूप से महि‍लाओं को झेलनी पड़ती है।  ऐसी पीड़ा देश के हर राज्‍य में रहने वाली महि‍लाओं की है। आप बि‍हार की खबर देखें या झारखंड की, राजस्‍थान की बात करें या छत्‍तीसगढ़ की, यूपी के शहर-गांव को देखे या हरि‍याणा को। तात्‍पर्य यह है कि‍ शराबबंदी के पक्ष में सारे देश की महि‍लाएं हैं। वो भी गरीब, दलि‍त वंचि‍त, मुस्‍लि‍म और आदि‍वासी महि‍लाएं है। संभ्रात घरों की महि‍लाओं को इससे कोई वि‍शेष परेशानी नहीं है। परेशानी तो उन औरतों को है जि‍नके पि‍ता, पति‍ या पुत्र इस  नशे का शि‍कार हैं। सबसे बड़ा दुख है कि‍ घर के मर्द जो कमाते हैं, वह शराब के ऊपर खर्च कर देते हैं। अपने पारि‍वारि‍क जि‍म्‍मेदारि‍यों का कोई नि‍र्वाह नहीं करता। उस पर हर शाम लड़ाई और गाली-गलौज। छोटी-छोटी बात पर पि‍टाई। खाना पसंद का न हो तो मार खाए औरत या गर्म खाना न मि‍ले तो भी गाली वही सुने। शराब के नशे में धुत्‍त होकर आदमी घर पर पड़ा रहता है। नौकरी करने वालों की नौकरी चली जाती है। गांव की औरतें अपनी जवान बहु-बेटि‍यों की सुरक्षा को लेकर चि‍ंति‍त रहती हैं कि‍ कहीं नशे के कारण कोई अपना या पराया उसकी अस्‍मत को दागदार न कर दे। इस नशे के कारण छोटी-छोटी बात पर हथि‍यार उठा लेना और गुस्‍से में हत्‍या हो जाता बहुत आम बात है।

अगर हम बात करें आदि‍वासी संस्‍कृति‍ की तो शराब और हड़ि‍या सेवन इनकी संस्‍कृति‍ का हि‍स्‍सा है। मगर अब गांव-गांव में वि‍रोध शुरू हो गया है और इसका नेतृत्‍व कर रही हैं महि‍लाएं। रांची के आसपास के दो सौ से ज्‍यादा गांवों में  शराब के खि‍लाफ़ मुहि‍म चलाई जा रही है। कई जगह महि‍लाओं के इस अभि‍यान में मुखि‍या, पंचायत प्रति‍नि‍धि‍ और पुरुष भी शामि‍ल हो रहे हैं। गांव में महि‍लाएं सुबह-सुबह लाठी-डंडा से लैस होकर नि‍कलती हैं और घरों और अवैध भट्ठि‍यों से जब्‍त शराब की हांडी , बर्तन, कनस्‍तर तोड़ दि‍ए जाते हैं और महुआ की बनी देशी शराब जि‍से 'चुलैइया' बोलते हैं, सड़कों पर बहा दी जाती है। जहां इस अभि‍यान का वि‍रोध होता है, वहां महि‍लाएं लाठी चलाने से नहीं चूकतीं। 

जाहि‍र है यह आक्रोश एक दि‍न का परि‍णाम नहीं। पीढ़ी गुजर गई, देखते, समझते झेलते। सबसे ज्‍यादा शि‍कार महि‍लाएं ही होती हैं। सि‍सई, गुमला की छोटी मुंडा अभी केवल 16 साल की है और काम के तलाश में रांची आ गई है। उसने अपना घर छोड़ दि‍या। कहती है, मैं छोटी थी तभी देखती थी कि‍ शाम को आज़ा दारू पीकर झूमते  हुए घर लौटते और लड़ाई -झगड़ा करते। कई बार तो बना हुआ तक खाना फेंक देते। कुछ दि‍नों के बाद पि‍ताजी भी यही करने लगे। दिन भर काम करते और जि‍तने पैसे सारे दि‍न काम कर कमाते, उसे दारू में खर्च कर लौटते। मां मना करती तो उसे मारते-पीटते।  यह रोज का तमाशा हो गया था। घर में कि‍सी-कि‍सी दि‍न खाने को नहीं होता और पि‍ताजी को पीने के अलावा कुछ और नहीं सूझता। बाद में मां बीमार पड़ी तो उनके इलाज के लि‍ए पैसे नहीं थे। वो मर गई। मगर पि‍ता का शराब पीना नि‍यमि‍त रहा। अब तो वह कमाने भी नहीं जाते। दि‍न भर पड़े रहते हैं घर में। इसलि‍ए मैं छोड़ आई उनको। बीच-बीच में घर जाकर पैसे दे आती हूं। मेरे मना करने पर नहीं मानते। मेरा घर बर्बाद हो गया और मैं पि‍ता के रहते भी अनाथ जैसी हूं। इसका कारण केवल शराब है। 

एक दूसरा कारण यह भी है महि‍लाओं के वि‍रोध का कि‍  शराब के अड्डे पर लोगों का जमावड़ा होता है जि‍ससे महि‍लाओं के ऊपर छींटाकशी की घटनाएं  होती रहती हैं। शराब का अड्डा तो चना-चबेना वहीं बि‍कता है। लड़कों की भीड़ जमा होती है वहां। यही सब वजह है कि‍ महि‍लाओं ने वि‍रोध शुरू कि‍या। रांची में गुलाबी गैंग भी जागरूकता अभि‍यान चलाकर शराबबंदी कर रही है। खुशी की बात यह है कि‍ यह अभि‍यान  पूरे देश में चल रहा है। बि‍हार की स्‍थि‍ति‍ तो बदल रही है।

बात वापस इस पर आती है कि‍ क्‍या महि‍लाओं के इस शराबवि‍रोधी अभि‍यान के दूरगामी परि‍णाम होंगे। नीतीश सरकार ने इसी मुद्दे के आधार पर चुनाव जीता और अगले लोकसभा चुनाव में शराबबंदी एक चुनावी मुद्दा बन सकता है नीतीश सरकार के लि‍ए। उत्‍तर भारत के कई राज्‍यों में महि‍लाएं शराब के ठेके खोलने का वि‍रोध कर रही है। यूपी में योगीनाथ के मुख्‍यमंत्री बनने के बाद महि‍लाआें को लग रहा है कि‍ वी यूपी में भी शराबबंदी करवा देंगे। देखा गया कि‍ कुछ राज्‍यों के दर्जन दो दर्जन जि‍ले में महि‍लाओं ने कुछ घंटे से लेकर कुछ दि‍नों दि‍नों तक शराब की दुकान के आगे धरना दि‍या। इसका प्रचार-प्रसार टीवी आैर अखबारों के माध्‍यम से हुआ। इसका त्‍वरि‍त परि‍णाम यह नि‍कला कि‍ देश के अनेक जि‍लों से महि‍लाओं के वि‍रोध की खबर आने लगी। औरतें गुट बना रही है। शराब के ठेके को नष्‍ट कर रही हैं। यह औरतों की शक्‍ति‍ और एकजुटता का प्रतीक है। साझा दुख सब महसूस करती हैं। इस बात को तमाम राजनीति‍क पार्टियां समझ रही हैं और आगे बढ़कर कदम उठाने का तैयार है। मध्‍यप्रदेश और यूपी में भाजपा सरकार शराबबंदी की बातें कर रही है तो इधर मध्‍य प्रदेश के मुख्‍यमंत्री भी कई चरण में स्‍थान नि‍र्धारि‍त कर शराब वि‍क्रय पर पाबंदी लगाने की बात कही है। महाराष्‍ट सरकार भी पूरी तरह से शराबबंदी की बात कर रही है। झारखंड सरकार ने शराब खुद बेचने की बात कही है तब से पुरजोर वि‍राेध हो रहा है यहां पर। वैसे भी पास के गांवाें में महि‍लाओं का अभि‍यान जारी है शराब के खि‍लाफ।

अब एक मुख्‍य बात कि‍ क्‍या वाकई महि‍लाओं में इतनी शक्‍ति‍ है कि‍ वह शराबबंदी पर अभि‍यान चलाकर राजनीि‍तक पार्टियों की नींदे उड़ा सकती है और देश की राजनीति‍ को हि‍ला सकती है। जवाब बेशक हां में है क्‍योंकि‍ हमें नहीं भूलना चाहि‍ए कि‍ अगर कि‍सी मुद्दे पर महि‍लाएं एकजुट हो गईं तो वह चुनाव में कि‍सी को भी हरा या जीता सकती हैं। तामि‍लनाडु में जयललि‍ता के कड़े टक्‍कर वाले चुनाव में जीत के पीछे महि‍ला वोट बैंक का हाथ था। और नीतीश के शराबबंदी के वादे का परि‍णाम तो सामने ही है। अभी शराबबंदी के मुद्दे पर महि‍लाएं एकजुट है। शराब के ठेकेदारों से उलझ रही है, पुलि‍स के डंडे भी खा रही। अपने पति‍ की आदत छुड़ाने के लि‍ए उससे मार खा कर भी  उसका वि‍रोध कर रही है। अगर नारि‍यां ऐसे ही एकजुट और सशक्‍त हो जाएं तो शराब क्‍या, देश की सत्‍ता पलटने का ताकत रखती है।

पारि‍वारि‍क जीवन पर असर
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शराब के तमाम दुष्‍परि‍णाम है। अत्‍यधि‍क शराबखोरी से न केवल सामाजि‍क और पारि‍वारि‍क जीवन बर्बाद हो रहा है बल्‍ि‍क लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य पर भी इसका बुरा असर पड़ रहा है। सड़क दुर्घटनाओं में बढ़ोत्‍तरी हुई है और कार्यक्षमता घटती है इससे। मगर आज तक कि‍सी भी सरकार ने इस पर पर्याप्‍त बंदि‍श लगाने की कोशि‍श नहीं की थी। 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार ने शराबबंदी कीर प्रक्रि‍या शुरू की थी। पहले चरण में एक चौथाई दुकानें बंद करवाई गई। मगर यह सुधार का कार्यक्रम ज्‍यादा नहीं चल पाया। 

बाद में शराब पीने-पि‍लाने की प्रवृति‍ बढ़ती ही चली गई। जहां आसानी से उपलब्‍ध नहीं होता शराब वहां तस्‍करी कर लाया जाने लगा। गरीब इस लत के कारण कच्‍ची शराब पीते और मौत के मुंह में चले जाते। युवा पीढ़ी भी बर्बाद होने लगी। शराब पीकर गाड़ी चलाने के कारण मौत के दर में भी बढ़ोत्‍तरी हुई। 

एनसीआरबी आंकड़ों के मुताबिक साल 2015 में शराब पीकर गाड़ी चलाने से 7061 हादसे हुए है जो सालाना बीते सालों की तुलना में 1.5 फीसदी ज्यादा थे। बिहार में एक साल में 5,14,639 लीटर देशी शराब जब्त किए गए। अंग्रेजी शराब 3,10,292 लीटर और बियर 11,371 लीटर  जब्त किए गए है। वहीं बिहार में पिछले 1 साल से शराब बंदी के चलते 44,557 जेल भेजे गए जबकि 40,078 लोगों पर मामला दर्ज किया गया है।

बिहार और केरल जैसे राज्‍यों में शराब पर पाबंदी की वजह से भारत में 2015 के दौरान शराब इंडस्‍ट्री की ग्रोथ भी 0.2 फीसदी रही है। यह पिछले 10 सालों में सबसे धीमी ग्रोथ है। यूरोमोनिटर की रिपोर्ट के मुताबिक कीमत बढ़ने, प्रतिबंध और कुछ राज्‍यों में वितरण में बदलाव की वजह से ग्रोथ घटी है। 2014 और 2013 में ग्रोथ दर 6-6 फीसदी थी, जबकि 2012 में 9 फीसदी और 2011 में 11 फीसदी थी।

अभी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के परि‍णास्‍वरूप राजस्थान में 2,800 शराब की दुकानें बंद हुईं हैं। हरियाणा में तकरीबन 200 बार बंद हो गए। महाराष्ट्र में 15,699 शराब की दुकानें और बार बंद हो गए। तो वहीं राजधानी दिल्ली में 100 शराब की दुकानें बंद हो गईं। तमिलनाडु में 3,320 दुकानें बंद कर दी गईं। यह संख्या सरकार के स्वामित्व वाले अकेले रिटेलर टी.ए.एस.एम.ए.सी. द्वारा संचालित कुल दुकानों के आधे से ज्यादा है।


अनुमान है कि‍ महि‍लाओं के वि‍रोध और सरकार के शराबंदी के फैसले के कारण सामजि‍क बदलाव बहुत तेजी से होगा। इधर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर भी होने लगा है। राजमार्ग पर  शराब के दुकान नहीं खुलेंगे तो लोग रि‍हायशी इलाकों में दुकान खोलेंगे। इसका पुरजोर वि‍रोध महि‍लाओं द्वारा होगा क्‍योंकि‍ घर के आसपास ठेका होगा तो उन्‍हें उसी समस्‍याओं से दो-चार होना होगा जि‍नके वि‍रोध में वो उठ खड़ी हुई हैं। बस अभि‍यान को जारी रखने के जरूरत है, सामाजि‍क बदलाव ऐसे ही आएंगे।



Monday, June 16, 2014

सम्‍मान के नाम पर

बिंदू पहाड़ पर तीर घि‍सने के नि‍शान 
बांस और केंद के पेड़, जि‍सके नीचे प्रेमि‍यों की अस्‍थि‍यां मौजूद है..


बचपन में कई कहानि‍यां सुनी थी..दादी से....दंत कथाएं.....लोक कथाएं.....खूबसूरत राजकुमारी.....दूर देश से आया राजकुमार.......सात भाईयों की प्‍यारी बहना...जो भाभि‍यों के अत्‍याचार को सहती है.....आखि‍रकार...उसे भाई ही मुक्‍ति‍ दि‍लाते हैं...अपनी पत्‍नि‍यों को त्‍यागकर....ऐसी ही अनेक कहानि‍यां जेहन में हैं...आधी-अधूरी.......
उस दि‍न अपनी यायावरी प्रवृति‍ के कारण शहर से दूर नि‍कल गई.....बूढ़मू प्रखंड के ठाकुरगांव को पार करती जा रही थी....यह रांची से करीब 30-35 कि‍लोमीटर की दूरी पर है। एक जगह मेरे पसंदीदा नीले गुलमोहर के कतार से लगे पेड़ों ने मुझे वि‍वश कि‍या कि‍ गाड़ी से उतरूं और कुछ तस्‍वीरों को कैमरे में कैद कर लूं। सामने ही एक खूबसूरत पहाड़ी थी।

मैं तस्‍वीरें ले रही थी और मेरा नन्‍हा साथी...यानी अभि‍रूप, मेरा बेटा,  पहाड़ देख कर मचलने लगा उपर जाने को। मैं उससे बात कर ही रही थी कि‍ दो महि‍लाएं आईं.....मुझे देखकर रूक गईं और कहा.....उस पहाड़ की तस्‍वीर ले रही हैं.....जाइए न....वहां जो तीर के नि‍शान बने हैं ...वहां से अब भी खून नि‍कलता है.....अगर उसकी खुदाई की जाए।

अब मेरी उत्‍सुकता जाग गई.... कुछ उनसे पूछा तो कुछ वहां के स्‍थानीय लोगों से पता कि‍या तो एक कहानी सामने आई। बि‍ल्‍कुल दादी की सुनाई गई कहानि‍यों की तरह।

सात भाइयों की इकलौती बहन थी। बहन बड़े प्‍यार से खाना बनाती थी रोज अपने भाइयों के लि‍ए। एक दि‍न जब वह साग बना रही थी....उसकी ऊंगली कट गई। और उस साग में उसका खून मि‍ल गया। उसके भाइयों को जब खाना दि‍या उसने तो उन्‍हें और दि‍न की अपेक्षा खाना ज्‍यादा स्‍वादि‍ष्‍ट लगा। वो बार-बार अपनी बहन से पूछने लगे कि‍ क्‍या मि‍लाया है आज खाने में। बहन ने कहा कि‍ जो रोज बनता है वैसे ही बना है।

मगर भाई नहीं माने। भाइयों के लगातार जि‍द पर उसे बताना पड़ा कि‍ साग में उसका खून भी मि‍ला है। भाइयों ने सोचा कि‍ जब खून के कुछ बूंद मि‍लने से खाना इतना स्‍वादि‍ष्‍ट हो सकता है तो बहन का मांस कि‍तना स्‍वादि‍ष्‍ट होगा। तब सब भाइयों ने योजना बनाई और बिंदू पहाड़ पर अपने अपने तीर घि‍सकर तेज कि‍या और दूर एक मचान बनाकर बैठ गए।
जब सांझ के धुंधलके में बहन पानी लाने जा रही थी तो उसे नि‍शाना बनाकर तीर तारा। जब वो मर गई तो उसके मांस का सालन पकाया और हड्डी को मचान..जो कि‍ केंद के पेड़ पर बना था....उसके बगल में जमीन पर गाड़ दि‍या।

लोगों का मानना है कि‍ उस जमीन के उपर बांस का पेड़ नि‍कल आया है। और बिंदू पहाड़ पर जि‍स जगह सातों भाइयों ने अपने तीर तेज कि‍ए थे..उसका नि‍शान बरकरार है और जब कोई उस जगह को थोड़ा गहरा खोदता है तो उसमें से खून नि‍कल आता है, आज भी।

ये कहानी कि‍तनी पुरानी है...कि‍सी को पता नहीं....मगर पहाड़ पर तीर पजाने अर्थात तेज करने के सात नि‍शान, केंद का पेड़ और उसके बगल में बांस का झुरमुट है....एक दंतकथा को सत्‍य सा प्रमाणि‍त करता है।

दरअसल इस कहानी को कुछ वक्‍त ने और कुछ बात छुपाने के लि‍ए तत्‍कालीन ग्रामवासि‍यों ने बि‍ल्‍कुल अलग रूप देकर एक कथा के रूप में बदल दि‍या। वास्‍तव में ये उस जमाने में भी ऑनर कि‍लिंग का मामला था। कुछ अनुभवी बुजुर्गों ने बताया कि‍ दरअसल उस लड़की को एक लड़के से प्‍यार हो गया था। भाइयों की इज्‍जत पर बात बन आई। बहन बहुत प्‍यारी थी सो पहले समझाया....मनाया। लड़के को भी डराया। मगर प्रेम में डूबे युवा इस बात को नहीं माने। आखि‍रकार भाइयों को कड़ा नि‍र्णय लेना ही पड़ा और उन्‍होंने तीर से वार कर दोनों को मार दि‍या। बाद में ये दंतकथा प्रचलि‍त हो गई कि‍ स्‍वादि‍ष्‍ट मांस के लालच में भाइयों ने बहन कर वध कर दि‍या।

 ये सच है...स्‍त्रि‍यां सदा से प्रताड़ि‍त होती आई हैं...समाज के नाम पर तो कभी प्रति‍ष्‍ठा के नाम पर उनकी बलि‍ चढ़ाई जाती रही है..चाहे वो पुरातन काल हो या आधुनि‍क काल......यह अलग बात है कि‍ पहले ये सब घटनाएं अगर कभी होती थीं तो उन्‍हें  कि‍स्‍सों में बदल दि‍या जाता था। अब भी यह केवल घटना के रूप में सामने आती है और पुलि‍स फाइल के नीचे बात दब जाती है....घटना ही बन जाती है।

इतने आधुनि‍क होने के बाद भी ऑनर कि‍लिंग जैसी घटनाओं को हम समाज से खत्‍म नहीं कर पा रहे...वास्‍तव में यह दुर्भाग्‍यपूर्ण है। क्‍या प्रेम इतना वर्जित है या फि‍र कि‍सी बालि‍ग को अपनी मर्जी से जीवन जीने के आजादी क्‍यों नहीं है।  प्राण जाए मगर समाज में प्रेम के कारण पगड़ी नीची नहीं होनी चाहि‍ए....और इसके बरक्‍स चाहे जि‍तने अत्‍याचार, अपराध और  कुकर्म होते रहें, उनकी अनदेखी की जा सकती है। इस पाखंड के साथ हम कि‍स मंजि‍ल की सफर में है...

दैनि‍क जनसत्‍ता के कॉलम 'दुनि‍या मेरे आगे' में 16 जून को प्रकाशि‍त

Friday, April 25, 2014

टपके भि‍नसारे महुआ के फूल.....

कूंचे पर खि‍ले महुआ के फूल 


भोर में महुआ चुनती तीनों बच्‍चि‍यां


स्‍मृति-गाछ से 
टपकते हैं
यादों के फूल
ज्‍यों टपके भि‍नसारे
जंगल में 
महुआ के फूल......

ये लि‍खा था मैंने....महुआ को लेकर..मगर कभी देखा नहीं था कि‍ भोर में ठीक सूरज उगने से पहले महुआ जब पेड़ से टपक कर गि‍रता है तो कैसा लगता है। यहां तक कि महुआ पेड़ पर फला-खि‍ला, कैसा लगता है...इसे भी देखने की लालसा थी।

यूं तो हम लि‍खना चाहे तो बहुत कुछ लि‍ख सकते हैं मगर जब तक अपने आंखों से देखकर न लि‍खा जाए तो वह जीवंत नहीं लगता।  हमने भी तय कि‍या कि‍ इस मौसम महुआ टपकने का आनंद ले। सो सुबह-सुबह चार बजे ही बि‍स्‍तर छोड़ दि‍या। 

आह...सुबह की ठंडी हवा ने तन सि‍हरा दि‍या। भाई को उठाया और चल पड़े जंगल की ओर। भोर में चि‍ड़ि‍यों का कलरव....पूरब की लालि‍मा....सूरज नहीं नि‍कला था....मगर उजास फैला था चारों ओर....मन रोमांचि‍त हो उठा।
हम पहुंचे जंगल में.....भाई ने दि‍खाया कि‍..देखो..यही है महुआ का पेड़। हम सि‍र उठाकर दरख्‍़त की ओर टकटकी लगाए देखने लगे...ढूंढने लगे महुआ के फूल.....उपर बहुत थोड़े से पत्‍ते नजर आए और शाख की फुनगि‍यों पर कूंचे खि‍ले थे...जि‍समें कई फूल थे। बहुत ही खूबसूरत....जैसे आसमान में तारा लटक रहा हो....जमीन के पास आकर। तभी सामने टप-टप करके चार-छह मुहआ के फूल गि‍रे......लपक कर हम गए और हाथ में उठाया...... 

उसे देखते ही दादी का गाया छंद याद आया.....

'' रूआ जैसा गुलगुल 
कि‍ पुआ ऐसा गाल 
दोनों दने भुरकी 
कि‍ चुटकी ऐसा बाल''

मुलायम पीले रंग का फल.....एक अजीब सी खुश्‍बू थी उसमें...जरा तीखी सी....फूलों को हाथ से हटा भी दि‍या जाए तो हथेली देर तक गमकती रहे। मैं तो पूरे दि‍न उस मादक गंध को महसूस करती रही। 

मैंने बहुत सारे फूल जमा कि‍ए। अचानक वहां तीन बच्‍चि‍यां दौड़ती आईं। सुबह में हल्‍की ठंढ थी..उन्‍होंने शाल से लपेटा था खुद को। बामुश्‍कि‍ल 7 से 10 वर्ष की होंगी। उन्‍होंने पेड़ के पीछे से अपने-अपने थैले नि‍काले। मैंने पूछा क्‍या है इसमें.....कहने लगी... मुहआ के फूल जमा कि‍ए हैं। मैंने हैरत से पूछा....ये कब कि‍या....थोड़ा शरमाकर हंसते हुए उनलोगों ने कहा....हमलोग तो हर सुबह चार बजे यहां आ जाते हैं....महुआ के फूल चुनने। ये हमारा रोज का काम है। यह पूछने पर कि‍ क्‍या करती हो....कहने लगी...सुखाकर खाते हैं...बेचते भी हैं।

मैंने सोचा कुछ और जानकारी एकत्र की जाए इस मधुक पेड़ के उपर। दरअसल बसंत के आगमन के साथ मधुक या महुआ के पेड़ भी पलाश की तरह निर्वस्त्र, पत्रहीन हो जाता है। शाखाओं की फुनगियों पर बने कूंचे में फूल विकसित होते हैं। ये कूंचे फूलों के गुच्‍छे का आभास देते हैं।  ये फूल खिलने के साथ आधी-रात से सुबह देर तक झरते रहते हैं। कूंची में वे सफेद दिखते परन्तु धरती पर आते ही हरापन लि‍या पीला नजर आता है।
 महुआ, आम आदमी का पुष्प और फल दोनों हैं। आम आदमी के सानिध्य के कारण इसे जंगली माना गया और जंगल के प्राणियों का भरपूर पोषण किया। आज के अभिजात शहरी इसे आदिवासियों का अन्न कहते हैं। सच तो यह है कि गांव में बसने वालों उन लोगों के जिनके यहां महुआ के पेड़ है, बैसाख और जेठ के महीने में इसके फूल नाश्ता और भोजन हैं।

कूंची से सूखकर गि‍रने वाले फूल स्‍वाद में मधु के जैसा लगता है। इसे आप गरीबों का कि‍शमि‍श भी कह सकते हैं।  म
हुआ के ताजे फूलों का रस निकालकर उससे बरिया, ठोकवा, लप्सी जैसे अनेक व्यंजन बनाये जाते हैं। इसके रस से पूरी भी तैयार होती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में महुआ जैसे बहुपयोगी वृक्षों की संख्या घटती जा रही है। जहां इसकी लकड़ी को मजबूत एवं चिरस्थायी मानकर दरवाजे, खिड़की में उपयोग होता है वहीं इस समय टपकने वाला पीला फूल कई औषधीय गुण समेटे है। इसके फल को 'मोइया' कहते हैं, जिसका बीज सुखाकर उसमें से तेल निकाला जाता है। जिसका उपयोग खाने में लाभदायक होता है।

महुआ भारतवर्ष के सभी भागों में होता है ।  इसका पेड़ ऊंचा और छतनार होता है। मुझे तो बेहद आकर्षक भी लगा।  इसके फूल, फल, बीज लकड़ी सभी चीजें काम में आती है । यह पेड़  बीस- पचीस वर्ष में फूलने और फलने लगता और सैकडों वर्ष तक फूलता-फलता है । इसकी पत्तियां फूलने के पहले फागुन चैत में झड़ जाती हैं । पत्तियों के झड़ने पर इसकी डालियों के सिरों पर कलियों के गुच्छे निकलने लगते हैं जो कूर्ची के आकार के होते है । इसे महुए का कुचियाना कहते हैं । कलियों के बढ़ने पर उनके खिलने पर कोश के आकार का सफेद फूल निकलता है जो गुदारा और दोनों ओर खुला हुआ होता है और जिसके भीतर जीरे होते हैं । 

महुए का फूल बीस बाइस दिन तक लगातार टपकता है । महुए का फूल बहुत दिनों तक रहता है और बिगड़ता नहीं । महुए के फूल को पशु, पक्षी और मनुष्य सब इसे चाव से खाते हैं । गरीबों के लिये यह बड़ा ही उपयोगी होता है । लोग सुबह जल्‍दी उठकर महुआ चुन लेते हैं नहीं तो गाय और बकरी इसे चर जाते हैं। महुआ का एक ही अर्थ या कहें उपयोग हमारे दि‍माग में बैठा हुआ है कि‍ इससे शराब बनता है। महुए की शराब को संस्कृत में 'माध्वी' और देसी में 'ठर्रा' कहते हैं ।
जब तक महुआ गि‍रता है, तब तक गरीबों का डेरा उसके नीचे रहता है। यह गरीबों का भोजन होता है। खास तौर पर जब बारि‍श में कुछ और खाने को नहीं होता। गोंड जाति‍ के लोग इसकी पूजा करते हैं। उनके जीवन में महुआ का बहुत महत्‍व है। पहले महुआ के बहुत पेड़ होते थे। कई जंगल भी। अब खेती के कारण पेड़ काट दि‍स गए हैं।
महुआ के बारे में इतनी जानकारी एकत्र करने के बाद मैं कह सकती हूं कि‍ वास्‍तव में यह एक ऐसा पेड़ है..जि‍सकी ओर ध्‍यान देना चाहि‍ए। इसे केवल शराब बनाने के काम में नहीं लि‍या जाता...वास्‍तव में यह बहुउपयोगी है और आदि‍वासि‍यों के जीवन का संबल भी।

30 अप्रैल को दैनि‍क हिंदुस्‍तान के संपादकीय पृष्‍ठ पर 'साइबर कॉलम' में प्रकाशि‍त

Saturday, January 18, 2014

फल्‍गु के तट पर.....


बि‍हार में गया इसलि‍ए प्रसि‍द्ध है कि यहां पूर्वजों की आत्‍मा की शांति‍ के लि‍ए पिंडदान कि‍या जाता है और बोधगया इसलि‍ए क्‍योंकि यहां पीपल के पेड़ के नीचे महात्‍मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्‍ति के लि‍ए है। 
बस यही दो पहचान है जो बचपन से मेरे मन में अंकि‍त थी। 

पहली बार बोधगया जाने का मौका तब लगा जब मैं  इंटरमीडि‍एट में थी और कालेज से ट्रि‍प गई। उस वक्‍त की मस्‍ती...बस में सहेलि‍यों के साथ खेली गई अंताक्षरी और बोधगया पहुंचकर बोधिवृक्ष के नीचे की शांति की याद अब तक है। वहां से पीपल के पत्‍ते पर महात्‍मा बुद्ध की उकेरी आकृति को लेकर आई थी और बरसों संभालकर रखा। 

पि‍छले वर्ष बोधगया में लगातार कई बम वि‍स्‍फोट हुए। उस घटना के करीब तीन महीने बाद एक बार फि‍र मैं वहां गई। इस बार वहां मुझे कुछ दि‍लचस्‍प बातें पता चलीं।

जब हम मुख्‍य मंदि‍र की ओर चले। चारों तरफ रौशनी ही रौशनी थी और गुंबद पर स्‍वर्णपरत चढ़ाया जा रहा था। बड़ा ही भव्‍य मंदि‍र.....बहुत सारे लोग...ज्‍यादातर वि‍देशी......श्रद्धा से नतमस्‍तक...भगवे वस्‍त्र पहने तो कुछ सफेद वस्‍त्रों में लि‍पटे देशी-वि‍देशी। असीम शांति मि‍ली वहां बैठकर। लोग प्रार्थना में लीन थे, झुंड के झुंड....बोधि वृक्ष के नीचे कई थालों में कमल के फूल भरे थे.....कुछ में फल......लोग पेड़ के पास लगी चारदीवारी को छूकर खुद को धन्‍य समझ रहे थे कुछ तो कुछ लोग पीपल पेड़ की पत्‍ति‍यां जो जमीन पर गि‍र रही थी....उठाकर खुश हो रहे थे, जैसे उन्‍हें बुद्ध का आर्शीवाद मि‍ल गया हो। समझ में आया कि कि‍तना भी भयावह वि‍स्‍फोट हो, श्रद़धा को कम नहीं कर सकता।

 महाबोधि मंदि‍र के ठीक बगल में फल्‍्गु नदी बहती है। इसका  प्राचीन नाम नि‍रंजना है। इसी नदी के तट पर बुधत्‍व की प्राप्‍ति हुई थी गौतम बुद्ध को। मैंने सोचा यहां आकर इस पवि‍त्र नदी के दर्शन न करूं तो कुछ अधुरा रहेगा। मंदि‍र के आसपास के सभी मठों के दर्शन कर लि‍ए थे। एक से एक भव्‍य मूर्ति बुद्ध की और उतना ही वि‍शाल परि‍सर....

हम नदी की ओर नि‍कले। शाम ढलने वाली थी। सूरज ठीक महाबोधि मंदि‍र के गुंबद पर डेरा जमाया बैठा हो...ऐसा लगा। जरा और पास से देखने की लालसा में नदी में उतरे.....वहां पानी बहुत कम थी..दूर तक रेत ही रेत...बहुत चौड़ी नदी की पाट मगर पानी बेहद कम...दूर बच्‍चे रेत पर फूटबाल खेल रहे थे। जरा आगे जाने पर देखा कि नदी पर पानी की पतली धाराएं और कई जगह बालू खोदकर पानी नि‍कले जाने के नि‍शान। मुझे जरा अजीब सा लगा। खैर..डूबते सूरज की तस्‍वीर  और नदी पर इतने कम पानी होने के कारण तलाशने की इच्‍छा साथ लि‍ए हम लौटे। 

जब कुछ लोगों से पूछताछ की गई तो बड़ी दि‍लचस्‍प कहानी सामने आई। एक तो मेरी जि‍ज्ञासा शांत हुई  कि गयासुर ने वरदान प्राप्‍त कि‍या था कि वह लोगों को  पाप मुक्‍त करना चाहता है और जो लोग यहां आकर कि‍सी की तर्पण की इच्‍छा से पिंडदान करे वो तर जाए....इसलि‍ए गया में पिंडदान होता है।

दूसरी कथा फल्‍्गु नदी की, कि वह नदी माता सीता के शाप के कारण भूमि‍गत हो गई। जब राम, सीता और लक्ष्‍मण बनवास पर थे तब उन्‍हें राजा दशरथ की मृत्‍यु का समाचार मि‍ला तो फाल्‍गु नदी के कि‍नारे पिंडदान के लि‍ए आए। राम के आदेश से आवश्‍यक सामग्री जुगाड़ के लि‍ए लक्ष्‍मण गांव की तरफ गए। उन्‍हें आने में देर होने लगी तो राम भी चले गए। दोपहर सर पर था और पिंडदान का वक्‍त बीता चला जा रहा था। राम-लक्ष्‍मण दोनों तब तक लौटे  नहीं तो सीता ने एक मि‍ट्टी का दीप जलाकर पि‍तरों का आहृवान किया। तभी वहां सीता को दो हाथ नजर आए। पूछने पर जवाब मि‍ला कि वे दशरथ हैं और सीता पर प्रसन्‍न हैं।तब सीता ने  पिंडदान कर दि‍या। दशरथ ने यह स्‍वीकार कर लि‍या। सीता ने कहा कि तर्पण वाली बात पर आपके बेटे वि‍श्‍वास नहीं करेंगे। तब दशरथ ने कहा कि इस बात की गवाही  फाल्‍गु नदी, गाय, केतकी फूल और आग देंगे। और संतुष्‍ट होकर दशरथ चले गए।

जब राम-लक्ष्‍मण लौट आए तो सीता ने उन्‍हें सारी बात बताई मगर उनलोगों ने यकीन नहीं कि‍या। तब इन चारों साक्षि‍यों को सीता ने बुलाया। परंतु ये चारों इस बात से मुकर गए।

 अब फि‍र से तैयारी कर पूर्वजों का आह़वान कि‍या तो  दशरथ आए और कहा कि सीता ने तो तर्पण कर  दि‍या ..अब दुबारा क्‍यों बुलाया मुझे। यह जानकर राम और लक्ष्‍मण लज्‍जि‍त हुए और सीता  से क्षमा मांगी ।
तब  सीता ने इन चारों को श्राप दे दि‍या। फाल्‍गु नदी को कहा कि तुम्‍हारा पानी अब भूमि‍गत बहेगा। तब से यहां रेत ही रेत है।

ये कट़ सत्‍य है कि नारी पर अवि‍श्‍वास की परंपरा अब भी कायम है। तब भी सीता पर राम-लक्ष्‍मण ने अविश्‍वास जताया था, आज भी पुरूषों को स्‍त्री की बात पर सहज वि‍श्‍वास नहीं होता। और सत्‍यता के साक्षी भी अपनी जुबान बदल लेते हैं। युगों-युगों से स्‍त्री अपनी क्षमता, और ज्ञान का प्रर्दशन करती आ रही है मगर हर बार अवि‍श्‍वास कि‍या जाता रहा है।
 तब तो फाल्‍गु नदी सीता के क्रोध का शि‍कार बन भूमिगत हो गई.अब भी श्रापि‍त है...रेतीली..अगर आज की नारी का श्राप भी ऐसे ही असर करे तो शायद आधी दुनि‍या ही मरूस्‍थल में बदल जाए।


तस्‍वीर--मेरे कैमरे से फल्‍गु नदी की

16 जनवरी को जनसत्‍ता के 'दुनि‍या मेरे आगे'  कॉलम में प्रकाशि‍त आलेख

Thursday, October 24, 2013

पवि‍त्र उजास पर ग्रहण.....


रांची में हुई बारि‍श के कारण कल भारत और आस्‍ट्रेलि‍या के बीच चल रहा मैच रद हो गया.....प्रशंसक मायूस और कुछ नाराज भी हुए....गुस्‍से में धौनी के घर का शीशा भी तोड़ दि‍या.....जैसे धौनी और इंद्र देव की साजि‍श से ही ये सब हुआ हो...

मौसम वि‍भाग ने पहले ही चेतावनी दी थी, मैच के दौरान बारि‍श की.....अभी दो-तीन दि‍न और बारि‍श होगी....आज भी हो रही है....दोपहर छि‍टपुट और शाम से लगातार...... बरसात ने दशहरे की खु शि‍यां पहले ही छीन ली थी,  अब मौसम वि‍भाग ने भवि‍ष्‍यवाणी की है कि‍ संभवत: दीपावली के दि‍न भी बारि‍श हो.....

लक्ष्‍मी  भक्‍त इस डर से कि‍ कहीं घर सूना रहने से लक्ष्‍मी न रूठ जाए...स्‍वागत के लि‍ए पहले ही बि‍जली के झालर और चाइनीज दि‍ये की लड़ी से घर सजाने में लग जाएंगे.....साल भर का त्‍योहार...सूना कैसे रहे घर-आंगन..

बारि‍श अपनी जगह और रोशनी के त्‍योहार का महत्‍व अपनी जगह....पूर्व सावधानी वश शायद हम सब यही करें...

और इस प्रक्रि‍या में उलझे हम एक बार भी नहीं सोचेंगे उन कुम्‍हारों के बारे में जो इस एक दि‍न के पर्व की तैयारी में महीनों से लगे रहते हैं...इस उम्‍मीद में कि दीपावली में  दि‍यों और खि‍लौनों की बि‍क्री से हुई आमदनी से उनके महीनों का खर्च नि‍कल जाएगा....
मैं वाकई मायूस और इस बेमौसम की बारि‍श से नि‍राश  हूं क्‍योंकि ......

कुछ दि‍नों पहले कुहासे भरी शाम में मैं जा रही थी कहीं....बरबस मेरी नजर एक कुम्‍हार के घर के सामने दि‍ये पकाते हुए भट़टे  पर पड़ी...चारों ओर धुआं-धुआं, आग का कहीं पता नहीं........कुम्‍हार के आंगन में दीपावली की तैयारी के लि‍ए गोलाई में भट़टा लगा था जि‍ससे नि‍कलकर सफेद धुंआ आसपास फैल रहा था। 

सबसे नि‍चली परत में खपड़े लगे थे....उसके उपर करीने से लगी ईंटो की परत दर परत....बीच की जगह में कच्‍चे दि‍ये रखे थे....लहकती आग के उपर....सबसे उपर पुआल की मोटी परत बि‍छाकर मि‍टटी से लीपकर मुंहबंद कि‍या गया था। क्रमश: कई चरण में ऐसे सजाकर, बीच में कोयले की आग के उपर रखे दि‍ये...चारों तरफ धुआं फैला था....अंदर हमारे घरों को उजाला देने वाला दि‍या और कुम्‍हारों के जीवनयापन का माध्‍यम, अपना अंति‍म स्‍वरूप प्राप्‍त कर रहा था। 

वहीं पास में कुम्‍हार कुछ सामान समेट रहा था। मैंने कुम्‍हार से पूछा....अभी तो दीपावली दूर है...अभी से पकाने लगे.....कहने लगा....दीदी...बहुत सारे दि‍ये बनाने होते हैं....समय और मेहनत दोनों लगता है...पहले मि‍टटी गूंधो, चाक से दि‍ए बनाओ....फि‍र उन्‍हें पकाओ....साथ में मि‍टटी के खि‍लौने भी पका लि‍ए जाते हैं.....फि‍र उन पर रंग-रोगन।

अगर खूबसूरत नहीं दि‍खेगा तो खरीदेगा कौन...हमारी मेहनत तो पानी में चली जाएगी। उस पर मौसम का ठि‍काना नहीं। बारि‍श पड़े तो दिये पकाएंगे कैसे....हमारे पास पक्‍की छत नहीं और जलावन की भी कमी है। इसलि‍ए समझि‍ए हमारी तैयारी साल भर चलती रहती है।

मुझे धुआं पसंद है.....शाम को लकड़ी के चूल्‍हे से नि‍कली आग या कोयला जलाने की गंध बहुत आकर्षि‍त करती है ....खासकर ठंड के दि‍नों में ऐसी चीजें मन को और भाती हैं। मैं कुछ देर ठहरकर उनके काम करने के ढंग को देखती रही....बात करती रही..और घर के लि‍ए कुछ दि‍ये भी खरीद लि‍ए....संझा-बाती के लि‍ए....

मन ही मन नतमस्‍तक थी उनकी मेहनत देखकर....मन में झोभ भी हुआ....इतनी मेहनत के बाद भी हमलोग  उनसे चि‍खचि‍ख करते हैं....कुछ पैसों के लि‍ए....जि‍स के कारण सपरि‍वार वे लोग मेहनत करते हैं।  वैसे भी बल्‍ब की रंगीन रोशनी ने दि‍ये की पवि‍त्र उजास पर ग्रहण लगा ही दि‍या है। उस पर से मौसम का कहर..

इस बार दीपावली में हमारे घरों को रौशन करने वालों के घर में मायूसी रहेगी...मौसम भी गरीबों के पेट पर लात मारने का काम कर रहा है और पक्‍की छतों वाले मि‍टटी के घरों में जलती एक दि‍ये को रौशनी को भी बि‍जली के रंगीन झालरों से बुझाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.....दो पैसे कम कराने को गरीब कुम्‍हारों से भी मोलभाव करेंगे.... यही रीत है..शायद

तस्‍वीर-- कुम्‍हार के जीने का जरि‍या और मेरे कैमरे की नज़र..


'जनसत्‍ता' 2 नवंबर को समानांतर कॉलम में प्रकाशि‍त आलेख

Sunday, October 6, 2013

मि‍ला दे मुझको मेरी माई से.....

आज दैनि‍क भास्‍कर पर दि‍ल्‍ली डेटलाइन से एक लीड खबर पढ़ी....'दीदी मुझे कपड़े पहनने नहीं देती' ... मैंने सोचा कि मैं भी कुछ भुक्‍तभोगी लड़कि‍यों के अनुभव साझा करूं...






13 वर्ष की गुड़ि‍या.....तोरपा की रहने वाली। रि‍श्‍ते के भैया-भाभी दि‍ल्‍ली घुमाने के बहाने से ले गए। कुछ दि‍नों तक अपने पास रखा, उसके बाद एक दि‍न एक प्‍लेसमेंट ऐजेंसी को सौंप दि‍या। यह कहकर कि कुछ पैसे कमा लो, फि‍र हम सब गांव वापस चले जाएंगे। संभवत: शाहदरा के वि‍श्‍वास नगर  में रहती थी वो, जैसा कि अपनी याद से गुड़ि‍या बताती है।

 कहती है गुड़ि‍या कि उसके जैसी और भी कई लड़कि‍यां थी एक कमरे के प्‍लेसमेंट एजेंसी में। कुछ दि‍नों बाद उसे एक घर में काम पर लगा दि‍या गया। शुरूआत में उसे 1500 देने की बात थी, मगर एक भी पैसा उसके हाथ  नहीं आया। घर के मालि‍क कहते थे कि तुम्‍हारे भैया-भाभी पैसा ले लेते हैं आकर। 

वो बच्‍ची दि‍न भर काम में लगी रहती। धीरे-धीरे बड़ी होने लगी। मगर उसके भैया-भाभी कभी दुबारा मि‍लने नहीं आए। पूछने पर जवाब मि‍लता कि वो इसलि‍ए तुमसे नहीं मि‍लते कि तुम उन्‍हें देखकर रोने लगोगी। भाई का नाम भाते भेंगरा और भाभी का नाम उर्शीला भेंगरा बताती है गुड़ि‍या। 

काम करते करते उसे 4 साल हो गए। न कभी भार्इ्र-भाभी आए...न ही मां की कोई खबर। पि‍ता तो पहले ही नहीं थे। जि‍स घर में काम करती थीं, वहां उसे अपमान और प्रताड़ना झेलनी पड़ी। दि‍न भर काम करने के बावजूद आराम के दो पल नहीं देता था कोई। जरा देर के लि‍ए बैठने पर डांट पड़ती थी। 

बड़ी होती गुड़िया को यौन प्रताड़ना भी झेलनी पड़ी। घर में ही रहने वाला दामाद अकेला पाकर छेड़छाड़ करता था। कुछ दि‍न सहन करने के बाद शि‍कायत की। हालांकि गुड़ि‍या कहती है कि शि‍कायत करने पर आंटी ने अपने दामाद को खूब डांटा। 

मगर अब गुड़ि‍या की सहनशक्‍ति जवाब देने लगी। वह घर आना चाहती थी। गांव की याद आती थी उसे। मां की याद आती थी। एक दि‍न पड़ोस की रहने वाली सहेली से मि‍लने भाग गई। कुछ दि‍न वहीं रही...वापस काम पर जाने का कतई मन नहीं था उसका। उसकी सहेली के पि‍ता ने थाने में खबर कर दी। वह चार महीने तक रि‍मांड होम में रही। आखि‍रकार उसका पता ढूंढकर उसे वापस झारखंड भेजा गया। अब वो नाजेरात कान्‍वेंट के आश्रयस्‍थली में है। उसके परि‍जनों की खोज जारी है।

गुड़ि‍या की उम्र तब 13 बरस की थी जब वो यहां से गई थी। 17 वर्ष की उम्र में वापस आई है। आंखों में सपना लि‍ए कि अपनी मां के साथ रहेगी, उसकी आंचल की छांव में। गांव के पीपल के नीचे गोटि‍यां खेलेगी सहेलि‍यों संग। मगर उसे अपने गांव के नाम के अलावा कुछ भी याद नहीं। जाने वो नाम भी सही है या नहीं। उसकी मां जिंदा है या क्‍या पता वो कि‍सी और शहर या गांव चली गई हो।

इन सवालों को न कोई जवाब मासूम गुड़ि‍या के पास है न ही पुलि‍स न शेल्‍टर होम कें संचालको के पास.....बस एक उम्‍मीद और होठों पर दुआ कि.....बरसों से बि‍छड़ी बच्‍ची को उसकी मां के आंचल की छांव मि‍ले। 

दूसरी तरफ है लातेहार महुआटांड सुगमी की एक 14 वर्षीया बच्‍ची करमी। रि‍श्‍ते की एक आंटी ले गई उसे। पांच महीने तक रही दि‍ल्‍ली में। लौटी तो हाथ में हजार रुपए भी नहीं थे।काम करने वाले घर में पि‍ता समान मालि‍क अपशब्‍द कहता था। आंटी से शि‍कायत की मगर कोई फायदा नहीं हुआ। अकेले होने पर शारीरि‍क उत्‍पीड़न झेला। एक दि‍न भाग नि‍कली। पहले र्नि‍मलछाया में 2 महीने रही और अब कि‍सान सेवा संघ के शेल्‍टर होम कि‍शोरी नि‍केतन में। 

वहां उसके परि‍जनों को खबर कर लड़की को उसके घर भेजा गया। मगर कुछ दि‍न बाद वापस आ गई। उसके पि‍ता ही उसे वापस छोड़ गए। क्‍योंकि उसकी मां दि‍न भर शराब पीकर पड़ी रहती है। कोई काम भी नहीं। पि‍ता को डर है कि करमी अपने घर रही तो फि‍र कि‍से के चंगुल में फंसकर दूर हो जाएगी। 

आंखों में बेपनाह चमक लि‍ए करवी टीचर बनने के लि‍ए जोरदार पढ़ाई कर रही है। चंचल करवी खुश है...भवि‍ष्‍य की आस लि‍ए...


तस्‍वीर--साभार गूगल

Friday, September 20, 2013

कास के फूल और शरद का आगमन


कल नि‍कल गई थी शहर से दूर.....अचानक नजर पड़ गई कास के सफेद फूलों पर। झट से याद आ गई स्‍कूल पाठ़यक्रम  में पढ़ी तुलसीदास रचि‍त शरद लालि‍त्‍य का वर्णन.....


 ‘वर्षा विगत शरद रितु आई, देखहूं लक्ष्मण परम सुहाई,

  फूले कास सकल मही छाई, जनु बरसा कृत प्रकट बुढा़ई'


पुराने को तज के नए की ओर देखने का वक्‍त है शरद ऋतु.....जब बारि‍श  समाप्‍ति की ओर होती है तो हमें सबसे पहले मैदानी इलाकों में कास के सफेद  फूल लहलहाते दिखाई पड़ते हैं। लगता है धरा ने सफेद चादर ओढ ली है।
बहुत 
ही मनोरम होता है यह दृश्‍य....कास के फूल जब तेज हवाओं से झूमते हैं तो
मन आनंदि‍त हो जाता है, जैसा कि कल मेरा हो गया था। उस पर से लगातार बारि‍श....सफेद आसमान में आच्‍छादि‍त बादल मन को धवल मुग्‍धता से बांध रहे थे। जैसे पूरी धरा स्नान कर तरोताज़ा हो गई हो. सब कुछ नया सुंदर मनमोहक.....

तो सामने खड़ी थी शरद ऋतु.....शरद ऋतु यानी त्‍योहारों का मौसम...फूलों का मौसम...सबसे खूबसूरत होता है नाजुक हरसिंगार का खि‍लना और धरती पर बिछ जाना.... मैं ढूंढती हूं रातों में खि‍ले हरसिंगार ...उसके नारंगी डंठल
को देख हर्षित होती हूं...और एकदम सुबह  समेट लाती हूं हथेलि‍यों में.... नाजुक अहसास के साथ शहर के कुछ कि‍लोमीटर दूर नि‍कल जाइए तो तालाब - पोखरों में लाल-सफ़ेद कमल और कुमुदनी लदे दि‍खते हैं, यहां तक कि गडढ़ों में भी कुमुदनी सुशोभि‍त होती है। जी ललक उठता है ..कि उतर जाएं पोखरों में और तोड़ लाए कुछ कमल...

यह मौसम होता है साफ नीला आसमान और ठंड के आगमन से पहले खूबसूरत मौसम का
सन्‍धि‍  काल। न गरमी न ठंड....मन खि‍ला-खि‍ला सा लगता है...खि‍ले फूल ...खुले आसमान की तरह...
मधुमालती की लताएं भरने लगती हैं इसी वक्‍त....शाम को मालती के फूलों की हल्‍की-हल्‍की मादक खुश्‍बू मन मोहती है और चांद अपने पूरे सौंदर्य के साथ होता है....शरद पूर्णिमा का चांद....सोलह कलाओं से परि‍पूर्ण..शरद में ही कृष्‍ण ने गोपि‍यों संग रासलीला रचाई थी.....

शायद इसलि‍ए हमारे कवि‍गण इस ऋतु के प्रशंसक हैं। नि‍राला लि‍खते  हैं...'झरते हैं चुंबन गगन के'  तो उधर वैदि‍क वांग्‍मय सौ शरद की बात करता है- 'जीवेत शरद: शतम्'..अर्थात कर्म करते हुए सौ शरद जीवि‍त रहें। 



यह ऐसा मौसम है जब न हमें ताप का अहसास होता है न ही ठंड का। फसलें भी लहलहाती हैं इसलि‍ए सबके मन में खुशी होती है। उपर से सबसे ज्‍यादा त्‍योहार शरद ऋतु में ही मनाया जाता है। अब पितृपक्ष शुरू हो गया। पंद्रह दि‍नों के बाद दशहरा। दशहरा में चार दि‍नों तक इतनी गहमागहमी होती है...लोग पूजोत्‍सव में इस कदर रमे होते हैं कि लगता नहीं पूरे झारखंड में कोर्इ समस्‍या या गरीबी है। 

वैसे भी झारखंड का राजनीति‍क मौसम जैसा भी रहे, यहां का प्राकृति‍क सौंदर्य इतना अभि‍भूत करने वाला है कि बाहर के राज्‍यों से आए लोगों की बातें छोड़ दीजि‍ए......हमें खुद अहसास होता है कि हम एक ऐसी जगह नि‍वास करते हैं जहां पर प्रकृति ने कूट कूट कर सौंदर्य भरा है। और यह  नैसर्गिक है, 
अब तक सरकारी उपेक्षा का शि‍कार है....शायद इसलि‍ए अछूता सौंदर्य आंखों में भर आता है।

तुलसीदास लिखते हैं- शरद के सुहावने मौसम में राजा, तपस्वी, व्यापारी, भिखारी सब हर्षित होकर नगर में विचरते हैं। और हम जैसे कुछ प्रकृति‍ प्रेमी शरद ऋतु का वर्ष भर इंतजार करते हैं और शहर के कोलाहल से दूर गांवों की ओर जा नि‍कलते हैं। 


23 सितंबर को जनसत्‍ता के संपादकीय पेज के 'समानांतर' कॉलम में प्रकाशि‍त आलेख
दैनिक लोकदशा के संपादकीय पेज पर डेली डायरी में प्रकाशि‍त
27/ 9/ 13 को लाइव हिंदुस्‍तान डाट काम के गेस्‍ट कॉलम में प्रकाशि‍त