Friday, December 12, 2025

वक्‍त...



कहीं कोई एक झलक सी म‍िल जाती है
तेज हवा के झोंके सा
ज‍िंंदगी का पन्‍ना, यकायक पलटने लगता है

ठि‍ठकती हूं, देखती हूं उस वक्‍त को
जो जाने कब, कैसे 
गुजर गया, अपनी छाप छोड़कर 

6 comments:

  1. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।
    सादर।
    ------
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शनिवार १३ दिसम्बर २०२५ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. यह रचना मुझे थोड़ा और भीतर तक ले गई। आपने उस एक पल की बात की है, जो अचानक सामने आकर हमें रोक देता है। मुझे अच्छा लगा कि आप याद को पकड़ने की कोशिश नहीं करतीं, बस उसे देखती हो। तेज हवा और पन्ना पलटने का रूपक बहुत सटीक बैठता है। यहाँ कोई शिकवा नहीं है, बस स्वीकार है।

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