Monday, February 22, 2016

मुलाकातों के पदचि‍ह्र


गर्म हवा से
सहरा की रेत पर उभरे
पांवों के नि‍शान
मि‍ट जाते हैं
पर मुलाकातों के पदचि‍ह्र
नहीं मि‍टते कभी
वो सपनों के नखलि‍स्‍तान में
रोज़ बनते हैं
गहरे होते चले जाते हैं
मन में
शि‍लालेख की तरह....। 

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