तकिए पर टिकाए माथा
अंधमुंदी आंखों से
देख रही थी अपना माजी़
सुन रही थी फिजाओं में
घुली आवाज
जो हर पल तुम्हारे पास होने का
अहसास
जिंदा रखता है
जो अब भी गुजरे कल से चला आता है
बहलाने, यूं ही
अंधमुंदी आंखों से
देख रही थी अपना माजी़
सुन रही थी फिजाओं में
घुली आवाज
जो हर पल तुम्हारे पास होने का
अहसास
जिंदा रखता है
जो अब भी गुजरे कल से चला आता है
बहलाने, यूं ही
पाया कि
तुम रात फिर चले आए थे
बालों पर फिरती रहीं
दो ऊंगलियां
कानों में उतरती रही सांसे
मैं सोती रही, रात दुलराती रही
सारी रात देखती रही
वो ही सुनहरा ख़्वाब
जो अब ख़्वाब में ही तब्दील होकर रह गया....
तस्वीर...चर्च के ऊपर चांद
बहुत सुन्दर रचना हैं..keep it up..achhiBaatein.com - Hindi blog for Famous Quotes and thoughts, Motivational & Inspirational Hindi Stories, Chanakya Niti, Samanya Gyan, Health Tips, Jokes and Personality Development Tips
ReplyDeletevaah..
ReplyDeleteआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (31-10-2015) को "चाँद का तिलिस्म" (चर्चा अंक-2146) पर भी होगी।
ReplyDelete--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
करवा चौथ की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
Bahut bahut dhnyawad aur aabahar aapka
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ReplyDeleteसुन्दर, भावपूर्ण
बेहद शानदार और भावपूर्णं प्रस्तुति।
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ReplyDeleteजय मां हाटेशवरी...
आप ने लिखा...
कुठ लोगों ने ही पढ़ा...
हमारा प्रयास है कि इसे सभी पढ़े...
इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना....
दिनांक 01/11/2015 को रचना के महत्वपूर्ण अंश के साथ....
पांच लिंकों का आनंद पर लिंक की जा रही है...
इस हलचल में आप भी सादर आमंत्रित हैं...
टिप्पणियों के माध्यम से आप के सुझावों का स्वागत है....
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
कुलदीप ठाकुर...
बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना।
ReplyDeleteबेहद शानदार
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