कई बार चाहा कह दूं
जी नहीं लगता आपके बिन
मगर हर बार कहने से पहले
जुबां कांपती है
अतीत से निकलकर एक काली याद
आंखों पर छाती है
शब्द खामोश हो जाते हैं
सारी कोमल भावनाओं को
तब वापस
अपने अंदर गटक लेती हूं
देखती हूं तुम्हारी ओर
प्रेम के सैलाब की झीनी सी
उम्मीद लिए
जो मुझे संग अपने बहा ले जाए
अपने स्निग्ध स्नेह से
अतीत की परछाईं मिटा दे
ताकि फिर मैं कह पाऊं
हां..मैं जी नहीं सकती आपने बिन
मगर पाती हूं
तुम्हारे अंदर वो ही
चिर खामोशी व्याप्त है
हिम से शीतल अहसास हैं
और दोराहे पर उलझे से खड़े हो
मेरी पहल की राह देखते से
जैसे, मेरे कदमों की दिशा देख
अपनी मंजिल का ढूंढोगे रास्ता
कितनी बार बताया है
जमाने ने भी समझाया है
लेकर नहीं दिया जाता है प्यार
मगर तुमने शायद
प्यार को यूं ही समझा है
देखो, मैं अब भी अपने अंदर उमड़ते
जज्बातों को
ज़बरन खामोश कर रही हूं
जो कह रहा चीख-चीखकर मुझसे
जी नहीं लगता उनके बिन
एक बार कह तो दो दिल की बात...........।
आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 29 - 10 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2144 में दिया जाएगा
ReplyDeleteधन्यवाद
Dhnyawad
Deleteआपकी इस प्रस्तुति का लिंक 29 - 10 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2144 में दिया जाएगा
ReplyDeleteधन्यवाद
जो मन में बस जाते हैं
ReplyDeleteवे लाख करो नहीं भुलाये जाते है
रह रह कर याद आते हैं ...
...प्यार की आकुलता व्याकुलता झलकते देर नहीं लगती
बहुत उम्दा।
ReplyDeleteAapka bahut-bahut dhnyawad aur aabhar
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