तुम्हारा नाम याद करने की कोशिश कर रही हूँ
जाने किस नाम से पुकारती थी तुम्हें उन दिनों…चेहरा एकदम साफ़ उतर आता है आँखों के आगे
जैसे सामने देख रही हूँ कोई चलचित्र
याद है तुम्हारे होंठों की वो अधखिली सी मुस्कान
तुम्हारी भौं का ऊपर उठना फिर गिरना
यहाँ तक कि तुम्हारी आँखों की
वो इबारत तक पंक्ति दर पंक्ति याद है
जो कई कोशिशों के बाद भी
तुम्हारे लबों तक न आ सकी थी
बस एक तुम्हारा नाम ही भूल गई हूँ …
क्या ज़ेहन से यादें भी चुन - चुन कर बिसरती जाती है ?

बहुत सुंदर
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ReplyDeleteआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 30 सितंबर 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
बेहतरीन
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