इस दीपावली
घर के हरेक कोने से
धूल-कचरा निकाल बाहर करते वक्त
लगा
कि मन में जमे गर्द को बुहारने को भी
होता एक झाड़ू
तो हम सारी बेकार बातें , बुरी यादें
और तकलीफ़देह पलों को
एक साथ जमा कर
कहीं बहुत दूर फेंक आते
तब
हमारे घर सा ही
जगमग करता हमारा मन भी
नए दियों की तरह
नई भावनाओं, नई उमंगों की लड़ियां
हम सजाते
खुशियों की फुलझड़ियां छोड़
गमों को पटाखे की तरह तीली दिखा
बहुत दूर भाग आते
इस दीपावली
दराज के कोने में चिपकी
तस्वीरों की तरह
मन में छिपा बचपन खींच लाएंं
छत के जंगले पर कंदील टांग
ताली बजा खुश हो जाएं
घी के दिये सी पवित्र मुस्कान चेहरे पर सजाएं
आओ, इस दीपावली
हम अपने मन को भी धो-पोंछ कर चमका लें
विगत के हर दर्द को
अपने मन से बुहार लें
हो जाएं उज्जवल, विकारविहीन
किसी के लिए मन में
कोई द्वेष न पालें
जगमग-जगमग दीप जला लें।

आओ, इस दीपावली
ReplyDeleteहम अपने मन को भी धो-पोंछ कर चमका लें
विगत के हर दर्द को
अपने मन से बुहार लें
हो जाएं उज्जवल, विकारविहीन
किसी के लिए मन में
कोई द्वेष न पालें
जगमग-जगमग दीप जला लें।
..बहुत सुन्दर सन्देश
ज्योति पर्व की हार्दिक शुभकामनायें!
ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, आज का पंचतंत्र - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !
ReplyDeleteBahut-bahut dhnyawad aapka
Deleteदीपावली आई गई। अब गंदगी की खैर नहीं। कोना कोना झाड़ कर ही दम लेंगें।
ReplyDeleteरश्मि जी बहुत सुन्दर रचना
ReplyDeleteरश्मि जी बहुत सुन्दर रचना
ReplyDeleteसुन्दर रचना ......
ReplyDeleteसुन्दर रचना
ReplyDeleteCharcha manch me shamil karne ke liye aapka aabhar aur dhnyawad
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