Saturday, February 21, 2015

'' नदी को सोचने दो ''



बस आज और कल......वि‍श्‍व पुस्‍तक मेला समाप्‍त.....................जि‍न मि‍त्रों ने बोधि‍ प्रकाशन के हॉल नं 12-12 A, स्‍टॉल नं 27-28 की सेल्‍फ में सजी कि‍ताब.....'नदी को सोचने दो' नहीं देखा......

देख आइए .....मेरा पहला एकल संग्रह है.....

यकीनन मुझे अच्‍छा लगेगा..... :) :) :) :) 

2 comments:

  1. तेरा आना और तेरा जाना दोनों ही कष्ट जन्य थे
    ,बस गम है तो ये कि हम ही इस से बेखबर थे
    सुन्दर रचना रश्मिजी

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  2. बधाई हो जी ...
    मौका मिला तो संलन लेने का प्रयास करेंगे ..

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