Sunday, September 20, 2020

''ल्‍हासा नहीं... लवासा''


यात्राओं में रूचि‍ है...घूमने के साथ-साथ प्रकृति‍ और वातावरण को जीना है, समझना है और खुद को परि‍पूर्ण करना है तो सचि‍न देव शर्मा की कि‍ताब ''ल्‍हासा नहीं... लवासा'' हाथ में उठाइये, और पढ़ जाइये। यकीन मानि‍ए, ऐसा तादाम्‍य बि‍ठा लेंगे आप, कि‍ लगेगा लेखक नहीं...आप ही उन स्‍थानों में घूम रहे हैं। 

आपकी दि‍लचस्‍पी बढ़ाने के लि‍ए पेश है ''ल्‍हासा नहीं...लवासा'' के पहले चैप्‍‍‍‍टर का कुछ अंश जि‍समें जमटा, हि‍माचल प्रदेश का यात्रा वर्णन है....

पुस्तक अंश

  'जमटा में सुकून के पल'  से

कुछ फ़ोटोग्राफ़ी करने की चाहत में मैं विनय के साथ अपना डीएसएलआर कैमरा लिए छह-सात फ़ुट चौड़ी कुछ आठ-दस सीढ़ियाँ उतरकर एक बड़ी समतल सीढ़ी तक पहुँचा ही था कि सीढ़ियों से लगी सीढ़ीनुमा चारदीवारी पर रखे गमलों के बीच से झाँकती सर्पीली, कुछ कच्ची, कुछ पक्की सड़क मानो न जाने किसी अंजान मंज़िल की ओर जा रही थी। मानो ऐसा लगा कि सड़क मेरे कैमरे के निवेदन पर थोड़ी देर के लिए रुकी हुई थी। उस घने पहाड़ी जंगलों के बीच से जाती उस सकरी सुनसान सड़क को कैमरे में क़ैद कर हम थोड़ा और नीचे उतरे तो गुड़हल के ताज़ा फूल अपने सौंदर्य को हमारे सामने परोसने के लिए हमारे इंतज़ार में ऐसे झूमते दिखें जैसे कोई किसी के इंतज़ार में चहलक़दमी करता है।

उस गुड़हल की रंगत कुछ अलग ही थी। शोख़ लाल रंग, काइया हरे रंग से भी गहरे रंग में गहराते पत्ते बारिश के बाद वहाँ पर मेहमानों की खेप को देखकर ख़ुश थे। उनकी सुंदरता का, खिलने और इठलाने का फ़ायदा ही क्या अगर कोई क़द्रदान ही-न-होतो, इसलिए ही आज बने-सँवरे से इतना इतरा रहे थे। उस गुड़हल की तस्वीर मेरे इस यात्रा की दो बेहतरीन तस्वीरों में एक थी।

नीचे की ओर रिसेप्शन के पीछे की तरफ़ लगे बड़े झूले वाले छोटे से लॉन में एक और बेहतरीन तस्वीर हमारा इंतज़ार कर रही रही थी। उस झूले पर बैठा मैं उस छोटे से लॉन के बीच लगे उस पौधे को निहार रहा था। वह पौधा कुछ अलग था। अचानक उड़कर उस पौधे पर आ बैठी तितली मानो कैमरे के साथ बैठे एक आदमी को फ़ोटोग्राफ़र समझ अपना पोर्टफ़ोलियोशूट कराने के इंतज़ार में बेचैन है। कभी इस पत्ते पर बैठती है तो कभी उस पत्ते पर। इतने में ही विनय ने बटरफ़्लाईचैलेंज दे मारा, “बहुत फ़ोटोग्राफ़र बना फिरता है ना, इस तितली की फ़ोटो खींचकर दिखा तो मानूँ तुझे मैं।यूँ तो मैं कोई फ़ोटोग्राफ़र नहीं लेकिन चैलेंज मिला था तो कुछ तो करना ही था। ज्यों ही मैं कैमरा रेडी करता हूँ वह तितली एक पत्ते पर शांत बैठ जाती है जैसे कि वह भी रेडी हो शूट के लिए। और फिर कभी पंख फैलाती है तो कभी सिमेटती, मानो पोज़ बना रही हो। कहीं तितली उड़ ना जाए इसलिए पहले ऑटोमोड पर फ़ोटो लेना सेफ़ऑप्शन लगा इसलिए पहले ऑटोमोड पर खचाखच तीन चार फ़ोटोज़ खींच डाले। फ़ोटोज़ आए भी ठीक। विनय को दिखाया। वह बोला, “अच्छे हैं,और खींच।फिर अपर्चरमोडट्राइ किया वह भी ठीक आया। लेकिन और पास से फ़ोटो लेने की तमन्ना के चलते ज्यों ही कैमरा तितली के थोड़ा और पास ले गया त्यों ही फुर्र से नदारद हो गई। लेकिन संतोष था कि विनय का चैलेंजआख़िरमीट कर ही लिया।

यार, आज अच्छी फोटॉग्राफी हो गई यहाँ आने पर वरना तो इस कैमरे को भी पड़े-पड़े जंग लग जाता। घर पर तो छुट्टी के दिन का भी एक रूटीनसेट हो चुका है। उसके बाहर कुछ भी कर पाना मुश्किल होता है।मैंने कहा।

विनय तुरंत अपने चिर-परिचित अंदाज़ में बोल उठा, “दोस्त, यही तो फ़ायदा है जमटा जैसी सुकून भरी जगह आने का।

अब हम वापस रिसॉर्ट में ऊपर की ओर चले जा रहे थे। शाम होने को थी। रेस्टोरेंट के बाहर खुले आसमान के नीचे डीजेनाइट की तैयारियाँ शरू हो चुकी थीं। हम अभी तक टीशर्ट और बरमूडा में ही घूम रहे थे। कविता और सौम्याडिनर के लिए तैयार होने के लिए अपने-अपने कमरों में जा चुकी थीं। बच्चे अभी तक झूला झूलने और हाईडएनसीक के चक्कर में धमा चौकड़ी मचाए हुए थे। चैम्प थोड़ा इर्रिटेटेड था। हमेशा की तरह उसकी यह शिकायत थी कि सावी और मनस्वी उसे अपने साथ खिलाने से मना कर रही थीं

बच्चे बार की एंट्रेंस पर बने पूलटेबल को देखकर पूल खेलने की ज़िद कर बैठे थे और ख़ास तौर से चैम्प तो कुछ ज़्यादा ही पगला गया था। ये सब बाद में, पहले जाओ फ़्रेश होकर चेंज करके आओ।विनय ने प्यार भरी डाँट मारते हुए उन्हें टॉपफ़्लोर पर हमारे कमरों की और दौड़ा दिया और हम भी धीरे-धीरे घूमते हुए लोहे की सीढ़ियों पर चढ़ते अपने-अपने कमरे के बाहर तक पहुँच गए। ठीक है तैयार होकर पंद्रह बीस मिनट बाद मिलते हैं।यह कहकर मैं अपने कमरे में आ गया और वह अपने कमरे में।

फ़्रेश होकर मैंने कविता से पूछा, “अरे मेरा कुर्ता-पजामा कहाँ है?” उसने उत्सुकता के साथ पूछा बाहर डीजेनाइट है, वहाँ पर कुर्ता-पजामा पहनोगे!उस समय मुझे उसके चेहरे पर बड़ा-सा प्रश्नवाचक चिह्न साफ़ दिख रहा था। मेरी मर्ज़ी, कुछ भी पहनूँ। वैसे भी मुझे कौन सा डांस करना है।मैंने नाराज़गी के साथ सफ़ाई देते हुए बोला। ठीक है, जो मर्ज़ी पहनो, हम कौन हैं रोकने वाले।कविता ने भी झूठ-मूठ ग़ुस्सा दिखाते हुए बोला। अरे मेरा वह मतलब नहीं था।हो सकने वाली लड़ाई की आशंका के मद्देनज़र मैंने रिट्रीट करने में ही भलाई समझी और धीरे से कुर्तापजामा पहनकर तैयार हो गया। कविता तैयार हो चुकी थी और मनस्वी को तैयार कर हम नीचे रेस्टोरेंट के बाहर ओपन टेरेस की और चल दिए।

सौम्या और बच्चे वहाँ पहले से बैठे स्टार्टर्सऑर्डर कर चुके थे। हम पहुँचे ही थे कि ठंडे पड़ते पहाड़ और सर्द होती हवाओं को अपनी गर्म भाप से टक्कर देते हनी चिल्ली पोटैटो हाज़िर थे। डीजे का मद्धिम संगीत भी पूरे वातावरण में ऊष्मा पैदा करने लगा था। जैसे-जैसे हनी चिल्ली पोटैटो का स्वाद जीभ पर चढ़ रहा था वैसे-वैसे वहाँ मौजूद युवक-युवतियाँ डीजे की धुन पर थिरकना शुरू कर रहे थे। महफ़िल अपने शबाब पर आने लगी थी। विनय भी आ पहुँचा था। मौसम ख़ुशगवार था। वैली में बने घरों की लाइटें सितारों की तरह टिमटिमा रही थीं। ऊपर से दिख रहा वह शहर शायद नाहन ही था लेकिन आसमाँ के सितारे, वह तो कहीं नज़र नहीं आ रहे। मैं परेशान था कि हिमाचल के उस छोटे से गाँव के बड़े से रिसॉर्ट में हमारी उस शाम की कौन गवाही देगा, उन तारों के सिवा। मैं सोचता जा रहा था और साथ-ही-साथ विनय के साथ बातों में मशग़ूल था। सहसा रिसॉर्ट की लाइटें गुल हो गईं, डीजे का संगीत शांत हो गया और संगीत पर थिरकते पैर ठिठक गए। सब अचानक से रुक गया। एक क्षण के लिए शून्य पैदा हो गया। इस शून्य के पैदा होते ही न जाने क्यों ख़ुद ही मेरी निगाह आकाश की ओर गई। आसमान में टिमटिमाते सितारें नज़र आने लगे थे। प्रकृति अपने पूर्ण रूप में दिखने लगी थी। लेकिन वह आनंद क्षणिक था। जनरेटर के स्टार्ट होते ही फिर से वही संगीत, संगीत पर नाचते लोग और वही धूम धड़ाका।

मैं और विनय प्रकृति के आंचल में बैठकर बतियाना चाहते थे। हम उठकर नीचे की ओर चल दिए और उस जगह आ पहुँचे जिस जगह कमरों का ब्लॉक था। उधर संगीत का शोर बहुत कम हो चला था। हम नीचे की ओर जाती उन्हीं चौड़ी-चौड़ी सीढ़ियों पर बैठ गए। कोई पाँच मिनट यूँ ही बैठे रहे। प्रकृति को अपने अंतर्मन में सहेज कर प्रकृति जैसा ही बन जाना चाहते थे, ईमानदारी से दिल से दिल की बात करने के लिए प्रकृति की तरह ईमानदार होना भी तो ज़रूरी है। यूँ तो डीजे की आवाज़ कुछ-कुछ उधर तक आ रही थी लेकिन हमें सर्द हवाओं की सर्र-सर्र करती आवाज़ों के अलावा कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा था। घाटी में दिखती सितारों की तरह टिमटिमाती लाइटें किसी लालटेन की तरह मुझे दिखाई दे रही थीं। कुछ देर के सन्नाटे के बाद आख़िर विनय ने शुरुआत की, “यार, एक बात बता, अच्छे लोगों को भगवान जल्दी क्यों बुला लेता है?” मैंने जवाब देते हुए कहा, “अच्छे लोगों की ज़रूरत तो इस लोक में भी है और परलोक में भी, शायद इसलिए ही।


3 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

सुन्दर

Rohitas ghorela said...

बुरों को यहीं अच्छा होना पड़ता है क्यूंकि बुरों के लिए इश्वर की नजर बनी ही नहीं.
सुंदर वर्णन.
dj वगैरह अब एक इतिहास हो गये हैं.
लाजवाब
मेरी नई पोस्ट- आत्मनिर्भर

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

सुन्दर समीक्षा।
बधाई हो।