Monday, February 20, 2017

बीस बरसों का नीला जादू


मैंने फोन लगाया - हलो

लगा, बहुत व्‍यस्‍तता के बीच उसने फोन उठाया। यंत्रवत आवाज आई। जी बोलि‍ए प्‍लीज।

 नहीं बोलूंगी प्‍लीज । शरारत उतर आई जुबां पर।

अब  पहचान उभरी जैसे । मशीनी आवाज में जैसे चॉकलेट की मि‍ठास घुल गई हो।  स्‍वर हल्‍का हुआ .....हलो, तुम हो।  व्‍हाट ए प्‍लीजेंट सरप्राइज।

 पहचान गए !

चहक उतर अाई अब आवाज में । तुम्‍हें भूला ही कब था। क्‍लास 6 में था जब से तुम्‍हारी आवाज से पल्‍पीटेशन बढ़ जाती है।

ओह रि‍यली...मैं सरप्राइज थी। उसके बि‍ंदासपने पर अब।

हां, कुछ नहीं बदला। तुम तब भी खास थी अब भी खास हो। कि‍सी-कि‍सी के लि‍ए कोई फीलि‍ंग कभी नहीं बदलती। कभी नहीं । नोट कर लो मेरी बात।

इतने बरस बाद भी...सब वही। मुझे यकीन नहीं हो रहा था।

हां, इतने बरस बाद भी। उधर से आत्‍मवि‍श्‍वास भरी आवाज आई।

तुम्‍हें याद भी है... हम कब मि‍ले थे अंति‍म बार। यह परीक्षा थी। उसकी या मेरी, पता नहीं । जाने उससे पूछकर खुद को याद दि‍लाना चाह रही थी या उसकी बातों की सच्‍चाई परख रही थी।

बीस बरस से ऊपर हो गए। बस एक बार देखा था तुमको इस बीच में । तुम नीले ड्रेस में थी। बहुत सुंदर लग रही थी। मैं देखता रहा।

तो रोका क्‍यों नहीं - थोड़ी उलाहना उभर आई मेरी आवाज में ।

डरता हूं। तब भी डरता था, अब भी। उसका जवाब उसकी आवाज की तरह सधी हुई लगी ।

मुझसे डरते हो। भला कि‍सलि‍ए। मैं तो बचपन की दोस्‍त हूं।

बताया न...अपनी धड़कनों से डरता हूं। अब भी उतनी ही तेजी से धड़कती है जब तुम्‍हें देख लेता था शाम को बैडमि‍ंटन खेलते वक्‍त ।

तब क्‍यों नहीं बताया, जब बताना था। अब तो बहुत दूर आ गए हम। शायद मेरी आवाज में हल्‍की मायूसी घुली हुई थी।

हि‍म्‍मत नहीं हुई। मगर तुम्‍हारी जगह कभी नहीं जाएगी इस दि‍ल से। मैं अपने बच्‍चों को संभाल सकता हूं अगर उनको कि‍सी से प्‍यार हो जाए। मेरी तरह। बचपन वाला प्‍यार। पागलपन वाला प्‍यार।

अब एक कहकहा उठा दूसरी ओर। मैं तरंगि‍त थी।

ऐसे बोल रहे जैसे कि‍तना अनुभव है तुम्‍हें..मैं तोल रही थी उसे।
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हां..झेला है बहुत। खुद में। अकेलेपन में । तुम थीं, मगर कह नहीं पाया। मुश्‍कि‍ल यह है कि‍ तुम्‍हारे अलावा सबको पता थी यह बात। मैं तुम्‍हें चाहता था बहुत। अब भी चाहता हूं। बहुत स्‍पेशल हो तुम। रहोगी। एक बार मि‍लना चाहता हूं तुमसे। उसी नीले रंग की ड्रेस पहनकर आना, जब भी आओ। करीब से देखना चाहता हूं। आंख भरकर।

तुम भावुक हो रहे थे। मैंने रोकना चाहा - छठी क्‍लास से संजोई हि‍म्‍मत अब अब काम आएगी क्‍या। वक्‍त वहीं रूकता है भला। तुम, मैं भावनाएं सब बदल जाती हैं।

तुम कह उठे । बीस बरस ही तो हुए हैं। चालीस पार हो जाएं तब जाकर मि‍लोगी तब भी मेरी पल्‍पीटेशन बढ़ी मि‍लेगी तुम्‍हें । मैं तुम्‍हारे साथ बचपन के उन्‍हीं लम्‍हों में ठहरा हुआ हूं जहां बोलना था तुमको.....कि‍ मैं

एक चुप्‍पी

क्‍या मैं ..मैं जानते हुए भी पूछती हूं ।

हंसते हो तुम। मत बढ़ाओ मेरी धड़कनें। बस मैं देखना चाहता हूं तुमको एक बार।

हां मि‍ल लूंगी एक रोज़। इतने बरस बाद बात हुई तो मुलाकात भी हो जाएगी कभी न कभी।

बस मेरे जाने के पहले एक बार मि‍ल लेना। सब जानते हैं तुम्‍हें। रि‍श्‍तेदार, यार-दोस्‍त, खासकर मेरी पत्‍नी। वो तुमसे मि‍लना चाहती है। कहती है - एक बार देखूं तो उसे जि‍से आप बचपन से अब तक प्‍यार करना नहीं भूले। वो कि‍तनी स्‍पेशल होगी।

कहां जा रहे तुम.... पूछा मैंने, जैसे एक हक सा हो उस पर।

संभला वो..एक ही शहर में ठि‍काना नहीं होता है। सरकार तबादला कर देती है हर दो तीन बरस बाद। क्‍या पता इस शहर में दोबारा कब आना हो। फि‍र इस जि‍ंदगी का क्‍या ठि‍काना।

एक आस बंधी..एक आस टूटी। यकीन का लम्‍हा जैसे जवान हुआ हो आज। ज्‍यादा मजबूत।

मि‍लोगी न गुड़ि‍या....एक बार

तरल थी आवाज। ऐसी धीमी, जैसे बहुत ताकत लगाकर बोले कोई। दि‍ल की गहराईयों से हज़ार अवरोधों को पार कर बाहर आती सी आवाज

हां पार्थ ....जरूर मि‍लूंगी तुमसे...कभी कि‍सी दि‍न।

फोन रखने वाले दो लोग अपने-अपने कार्यक्षेत्र के अधि‍कारी नहीं, बल्‍ि‍क वो दो छोटे स्‍कूली बच्‍चे थे जो हर शाम खेल कर घर जाने से पहले बि‍छड़ते वक्‍त एक दूसरे से पूछते थे। कल खेलने आओगी न गुड़ि‍या। हां पार्थ...आऊंगी। तुम देर न करना।

गुड़ि‍या को पता था, इधर बूंदे हैं तो उधर सावन होगा। प्‍यार तो उसने कि‍या था न। और मैंने ....गुड़ि‍या के दि‍ल ने कोई जवाब नहीं दि‍या। बस आंधि‍यां चलती महसूस हुई। जाने कमरे के अंदर या जाने बाहर।


5 comments:

Vishnu Sharan said...

गुड़िया याद दिला दी आपने तो

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 21 फरवरी 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

प्रतिभा सक्सेना said...

सरल-तरल!

savan kumar said...

प्रेम वहीं हैं जहाँ कभी मिलन नहीं होता ............. अगर प्रेम में मिलन हो जाए तो शायद राधा -कृष्ण की हमें कभी याद न आए। जो याद आता रहा हैं वो ही प्रेम हैं।
सच्ची सुन्दर सी शब्द रचना
http://savanxxx.blogspot.in

सुशील कुमार जोशी said...

सुन्दर।